आज स्कूल जाते वक्त दोनों बच्चे एलान कर गए थे - ' पापा ऑफिस से जल्दी आ जाना , डिनर बाहर करेंगे । ' काफी दिनों से साथ में बाहर घूमने भी नहीं गए थे । घड़ी की सुइयों के साथ बंधी दिनचर्या से कुछ नीरसता - सी आ गयी है । शाम के छह बज गए हैं । घर जल्दी पहुंचना है , आज बस की कतार में नहीं लगूंगा । मैंने टैक्सी रोकी और बैठ गया । सोचने लगा- ' रोज 20 रुपये लगाकर एक घंटे में घर पहुँचता था , आज 150 रुपये खर्च कर रहा हूँ । जल्दी पहुँच भी तो जाऊँगा । ' लाल बत्ती पर टैक्सी रुकी , मोगरे की वेणियाँ हाथ में लिए एक लड़की टैक्सी की खिड़की के पास खड़ी हो गयी । याद हो आया - पहले मैं श्यामा के लिए कई बार वेणी ले जाया करता था , पर अब बातें भूली बिसरी-सी हो गई । मैंने उस लड़की को ३० रुपये दिए और एक वेणी ले ली । घर पहुंचा - बच्चे तैयार ही थे और श्यामा भी । गजरा देख कर श्यामा मुस्...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !