राजनीति अपनी अनुकूलता तलाशने के लिए जानी जाती है। इस समय चुनावी सरगर्मी रफ्तार ले चुकी है। सभी राजनीति दल व नेता हर जाति वर्ग को रिझाने में कोई कमी नहीं रख रहे हैं। दलित वर्ग को अपनी ओर करने के लिए सबसे ज्यादा उनके हित में काम करने वाली पार्टी की छवि बनाने के लिए उठापटक हो रही है। उनके साथ भोजन करना, उनके कंधों पर हाथ रख कर आत्मीयता दिखाना, उनके साथ फोटो खिंचवाना-राजनैतिक दांवपेंच ही तो है। दलितों में अपनी पैठ को बढ़ाने के लिए सामाजिक समरसता कार्यक्रमों का आयोजन जोर शोर से हो रहा है। नेताजी ने कलेक्टर के द्वारा दलितों की बस्ती की जानकारी ली। तय हुआ- उनकी बस्ती में 'समरसता भोज' रखा जाय। हरिया जाटव का घर दलित मोहल्ले के बींचों बीच में है, वहीं भोजन किया जाय, इससे पूरा मोहल्ला कवर हो जाएगा। दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए खेती द्वारा मशक्कत करने वाले हरिया के परिवार मे -पत्नी और दो बच्चे। सप्ताह भर पहले हरिया को सूचित कर दिया गया- 'नेताजी तुम्हारे घर भोजन करेंगे।' अपने ही परिवार का पेट भरने में असमर्थ हरिया...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !