ख्वाहिश ही तो है, रह रह कर उठना है इसकी फितरत। जिंदगी के हर पड़ाव पर अरमान हैं कि जमे रहे अन्तरत। मुद्दत से इन आँखों में तरवरिश नहीं झलकी। ख्वाहिश की कोई इन्तिहा नहीं क्यूं कर अब छलकी। जाने कल जिंदगी के फैसले का होगा क्या इम्कान। ख्वाहिश- शेष लम्हे हंस कर बिता लें न हो कोई हलकान। इस काबिल नहीं, कलम बन किसी की खुशियां लिख दूँ। हाँ, ख्वाहिश यही, रबड़ बन किसी के गम मिटा दूँ। वर्षों से जज्बात, एहसास अब क्यों तो जाग गए ? अरमानों को सदा दिल में दबा 'काश' ही बढ़ गए। स्नेह, उमंगों का हो संचय, सदा करूँ ऐसा काम। हर परिजन की यादों में लिखा रहे मेरा नाम। प्रभु, ख्वाहिश यही अगला जन्म पंछी बन कर पाऊं। मंदिर हो या मस्जिद, स्वच्छंद हो मुंडेर पर बैठ जाऊं। जात-धर्म का न कोई डर, 'खुले पंख' पा मैं इतराऊँ। मज...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !