Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2021

ख्वाहिश

ख्वाहिश ही तो है, रह रह कर      उठना है इसकी फितरत। जिंदगी के हर पड़ाव पर अरमान       हैं कि जमे रहे अन्तरत। मुद्दत से इन आँखों में      तरवरिश नहीं झलकी। ख्वाहिश की कोई इन्तिहा नहीं      क्यूं कर अब छलकी। जाने कल जिंदगी के फैसले का      होगा क्या इम्कान। ख्वाहिश- शेष लम्हे हंस कर बिता लें      न हो कोई हलकान। इस काबिल नहीं, कलम बन      किसी की खुशियां लिख दूँ। हाँ, ख्वाहिश यही, रबड़ बन      किसी के गम मिटा दूँ। वर्षों से जज्बात, एहसास अब      क्यों तो जाग गए ? अरमानों को सदा दिल में दबा      'काश' ही बढ़ गए। स्नेह, उमंगों का हो संचय,       सदा करूँ ऐसा काम। हर परिजन की यादों में      लिखा रहे मेरा नाम। प्रभु, ख्वाहिश यही अगला जन्म      पंछी बन कर पाऊं। मंदिर हो या मस्जिद, स्वच्छंद हो      मुंडेर पर बैठ जाऊं। जात-धर्म का न कोई डर,      'खुले पंख' पा मैं इतराऊँ। मज...

सुबह का भूला

मैं मम्मी पापा के पास इंदौर आया हूँ। 10 दिन पूर्व ही पापा को रिटायरमेंट मिला है। सोहम की पढ़ाई के कारण शिवानी और सोहम नहीं आ सके। मैं कुछ दिन इंदौर रहूंगा। कई महीनों से पापा को अपने रिटायरमेंट का इन्तजार था। जब-तब फोन पर कहा करते- 'बहुत कर ली भाग दौड़, अब आराम करूंगा।' मानो कोई जश्न की तैयारी हो।            मुझे दो दिन में ही घर में काफी परिवर्तन लगा। पापा की दिनचर्या ही बदल गई। देर रात में सोना, देर से उठना। टी. वी. अखबार, किताबों में दिन बीतता, एक दो चाय-कॉफ़ी की एक्स्ट्रा डिमांड। मम्मी की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं। यहां दादी-दादाजी साथ में रहते हैं। मम्मी ने सुबह उठकर तीनों के लिए चाय बना ली, तीनो ने साथ में पी ली, फिर लग गई अपनी ड्यूटी पर। पापा उठे, तब उनके लिए अलग से चाय बनी। पहले, चारों साथ में बैठकर चाय पीते, अखबार, घर-परिवार, रिश्तेदारों की चर्चा होती। सुबह की चाय चारों के चेहरे पर मुस्कान और आत्मीयता ला देती।              पहले घड़ी की सुई से काम बंधे थे, अब ऐसा नहीं। पापा के टिफिन का खाना बना, तभी सब का, बस---। अ...