आज ही की पावन बेला में थामे थे हाथ , सुख -दुःख में मिलकर चले साथ-साथ | प्रेम और विश्वास है भरपूर कमाया , जन्नत - सा घर मिल कर बनाया | खुश हैं जिन्दगी में जो कुछ मिला , जो न मिला , ना है इसका गिला | जीवन में रिश्तों का भण्डार मिला , कुहासे के बीच आशाओं का अम्बार मिला | बुजुर्गों के आशीष की सम्पदा मिली , बच्चों का प्यार , सहयोग अपार मिला | रिश्तों में रिश्ते यूँ ही फलते रहे , हम पीढ़ियों - बीच सेतु बने रहें | रुठते-मनाते हम यूँ ही चलते जाएँ , बन संबल एक दूजे का साथ निभाए |
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !