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Showing posts from October, 2021

चाय की टपरी

पेड़ के तले वो दीनू की गुमटी, टीन की छप्पर, वो चाय की टपरी। भक भक करता सुलगता स्टोव, तिस पर चढ़ी हत्थे वाली भगौनी। अदरक की खुशबू उड़ाती चाय,  कदमों को खींच लाती चाय। ईंटों के स्तूप, पुरानी टूटी कुर्सियाँ, आड़े तिरछे पत्थर, उल्टे लगे पीपे। जिस पर बैठ अखबार बाचना, महफ़िल, अखबार और चाय का संगम।  दुनिया के हाल पर होता है विवेचन, कहीं फेंका गया तेजाब, कहीं लुटा हिजाब। फसल हुई तबाह, कर्ज नीचे दबा कृषक, यहां सभी चिंताए मुखर होती निर्बाध। सुलगते, दहकते देशभक्त जज्बात, विद्रोह बन आ जाते लबों पर। सत्ता के कार्य कलापों पर, हो जाया करती बहस। चंद क्षणों में सिमट जाता ,यह विस्तृत संसार। फैशन हो या फ़िल्म, चर्चाएं हैं बदलते जमाने की। कुल्लड़ थामे हम पढ़ जाते पूरा अख़बार। कटिंग चाय की चुस्की के साथ, दोस्तियाँ थामे रहती हैं हाथ। पास से जाती देख नवयौवना, मुस्कान के साथ दोस्तों का फुसफुसाना। बोझिलता में लाती नई उमंग, चाय का स्वाद बढ़ाती यह तरंग। जाते-जाते, "चल यारा, कल मिलते है, इसी समय, इसी चाय की टपरी पर।"