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धर्मभाई

                     कुछ ही महीने पहले मनीष का ट्रांसफर हुआ। मनीष और मिताली नई जगह , नए शहर में अनजान राहों और अनजान लोगों के बीच स्वयं को धीरे धीरे ढाल रहे थे। कोशिश जारी ही थी कि मनीष का एक्सीडेंट हो गया। अभी तो मिताली का पड़ोसियों से परिचय भी नहीं हुआ। मनीष को अस्पताल में भर्ती किया। इस शहर में कोई जान पहचान का ही नहीं। डॉक्टर ने कहा- " खून काफी बह गया है, अभी खतरा टला नहीं है।" मिताली के पास जो भी रकम थी खत्म हो गई। कल क्या होगा? मिताली सोच रही थी- 'माँ-पिताजी को फोन करूँ? पर वे क्या कर सकेंगे, उनकी चिंता और बढ़ जाएगी। भैया को फोन करूँ? ना, ना, भाभी को अतिरिक्त खर्चे पसन्द नहीं। हे प्रभु, मदद करो। कोई राह सुझाओ।' मिताली शून्य- सी घर की तरफ चली जा रही थी, तभी तीव्र गति से एक बाइक उसके पास से गुजरी। उस पर बैठे व्यक्ति का पर्स सड़क पर गिर गया। मिताली ने पर्स उठाया, बाइक के पीछे दौड़ी। उन सज्जन को पुकारकर रोकने की कोशिश की, पर असफल रही। घर पर आकर पर्स खोला, उसमें 40 हजार रुपए थे। रुपयों के साथ एक पहचान पत्र, मोबाइल नंबर और पता भी। मिताल...
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इच्छा का सम्मान

          डॉक्टर सक्सेना आज फिर अपने बड़े बेटे पर झल्ला पड़े-"सुनील, तुम इस तरह समय बर्बाद करते रहोगे, तो नीट कैसे क्लियर कर पाओगे?" "पापा एक घंटे के लिए बैडमिंटन खेलने गया था। आपके कहे अनुसार कोचिंग भी जॉइन कर ली। आप जानते हो, मैं मेडिकल में नहीं जाना चाहता हूँ। मैं स्पोर्ट्स में अपना कैरियर बनाना चाहता हूँ।" "क्या, मेडिकल में जाना नहीं चाहता? अरे, मेरा यह हॉस्पिटल कौन संभालेगा? तुम्हारा छोटा  भाई बीमार रहता है, उससे MBBS की उम्मीद नहीं कर सकता। तुम्हें हर हाल में नीट क्लियर करना होगा।" 'हमेशा दूसरों के हिसाब से जिंदगी जिओ।'-यह बड़बड़ाता हुआ सुनील अपने रूम में चला गया।           डॉ. सूर्यकांत सक्सेना का बड़ा मल्टीस्पेशलिस्ट नर्सिंग होम है। कड़ी मेहनत से यह अस्पताल खड़ा किया है। छोटे शहर में इनका अलग रुतबा है। अस्पताल में कई स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स भी बैठते हैं, जिस से एक ही जगह कई बीमारियों का इलाज हो जाता है। सुनील के व्यवहार से डॉ. सक्सेना परेशान हो गए। रात पत्नी से बोले- इसे पढ़ाई के लिए दूसरे शहर भेजना पड़ेगा। यहां के यार-दोस्तों से दूर रहे...

पहचान

          पंद्रह दिन पूर्व स्निग्धा को हॉस्टल वार्डन की जिम्मेदारी मिली। एक साधारण गांव में यह स्कूल है। प्रायः साधारण, निर्धन परिवार के बच्चे ही यहाँ रहते हैं। स्निग्धा को दो रूम का क्वार्टर मिल गया। दरवाजे पर नेमप्लेट लग गई- 'स्निग्धा शर्मा, छात्रावास अधीक्षिका'। भैया जैसा रुतबा तो नहीं, पर पहचान तो मिली। घर से निकली, जब भैया भाभी नाराज थे। भाभी ने कहा था- "तुम सही गलत रास्ते समझती हो। पर घर से दूर अनजान जगह पर रहना आसान नहीं है। जब भी लगे, घर लौट आना। माँ को तुम्हारी कमी खलेगी।" भैया बोले थे- "तुम माँ की स्थिति देख रही हो! अब इनके निजी कामों में भी सहारा देना पड़ता है। तुम्हें माँ के प्रति अपने दायित्वों का अहसास होना चाहिए। तेरी भाभी पर सारा बोझ आ जाएगा। यहाँ मिल बाँट कर सारे काम हो जाते हैं, वहाँ तुम अकेले कैसे मैनेज करोगी?"           स्निग्धा चालीस वर्ष की हो गई है, पर भैया आज भी उसे दायित्वों का बोध करा रहे हैं, जब कि वे भूल गए- उसके प्रति भी उनका दायित्व है। जिससे स्निग्धा ने प्यार किया, उसे भैया ने दुत्कार दिया क्योंकि उसकी जाति ...

लकीरें

हर एक लकीर दे रही पहचान, जहां से गुजरी छोड़ गई निशान। एक लकीर क्या खिंच गई, हिस्सों में बांट कर चली गई। काश, खिंचती लकीर जोड़ने के लिए, पूरे जहान को समेटने के लिए। कभी फुर्सत में हथेलियां तकती हूँ, इन आड़ी तिरछी लकीरों को देखती हूँ। क्या इन उलझी लकीरों में लिखी है किस्मत,  पर जिनके नहीं हैं हाथ, उनकी भी होती है । किस्मत। पत्थर पर लकीर खिंच गई, मानो मन के संकल्प को जता गई। माथे पर पड़े बल बन गई लकीरें, हाव-भाव दर्शाते ये सल, लकीरें। हर लकीर बोल रही है एक जुबाँ, चेहरे पर झुर्रियां जता रही तजुर्बा। लकीरों का क्या? आकार, रूप बदल जाता है, कर्म हर लकीर को बदल देता है।

अस्तित्व

           आज घर में भूचाल आ गया है। सुबह ही सुशीला ने ऐलान कर दिया है- वह कॉलेज में दाखिला लेंगी। पति रमाकांत बोले-" तुम अपनी उम्र जानती हो ना! पचास वर्ष की हो गई हो। तुम्हारी उम्र बनारस, हरिद्वार जाने की है, न कि कॉलेज जाने की।" "पढ़ाई के लिए भला कोई उम्र होती है, मैंने फैसला कर लिया है।" "सुशीला, एक कहावत है- बूढ़े मुंह आए मुंहासे या सींग काटकर बछड़े में शामिल होना। तुम्हें शर्म नहीं आएगी।" "अजी शर्म तो तब आई जब इंटर पास होते ही शादी कर दी गई तब 18 वर्ष की थी। तीन वर्षों में 2 बच्चों की माँ। अब 2 बच्चों की दादी, 2 बच्चों की नानी।" बेटा- "माँ, आप कॉलेज जाओगी, तो घर कौन संभालेगा?" सुशीला- "इस टप्पर को संभालने का ठेका मेरा ही है क्या? अपने बच्चे खुद पालो, यह भी कोई बात हुई!" बहू- "माँ, क्यों न आप correspondance कोर्स से BA कर लो।" "ना, बिल्कुल नहीं, मैं अपने सहपाठियों के साथ पढ़ना चाहती हूं। मैं अपनी सारी जिंदगी खुद को अलग अलग भूमिकाओं में फिट करती रही, लेकिन इन सब में मैं कहाँ हूँ? अब मैं अपने अस्तित्व की पहचान बना...

परफेक्ट मदर

           कल माँ जी (मेरी सास) के पास उनकी एक शुभचिंतक सहेली आई। बातों- बातों में कह गई- 'मेरी बहू से अपने बच्चे ना संभलते।' माँ जी ने कह दिया- 'तो तुम थोड़ा सहारा लगा दिया करो।' बात वही खत्म हो गई। अपने बच्चे ना संभलते- कहने का तातपर्य यही कि वह एक जिम्मेदार माँ नहीं है। क्या अपनों से सर्टिफिकेट की जरूरत है? किसे अधिकार है यह तय करने का कि फलां महिला अच्छी माँ है या नहीं।            आज एक फ़िल्म देखी- 'मिसेस चटर्जी वर्सेज नॉर्वे'। यह एक सत्य घटना पर आधारित है। नॉर्वे में रह रहा भारतीय परिवार नॉर्वे के तौर तरीकों और कानून से अनभिज्ञ था। एक भारतीय माँ अपने बच्चे को गलती करने पर पिटती है- जिसे अत्याचार माना गया। दाल चावल चम्मच की बजाय हाथ से खिलाना पसन्द करती है- जिसे जबरन ठूंसने की उपमा दी गई। कई काम हैं, जिन्हें हर देश की माँ अपने बच्चे के साथ करती है। भारतीय संदर्भ में ये बातें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन नॉर्वे में यह कानून का उल्लंघन है, वहाँ चाइल्ड वेलफेयर सर्विस इन मातृ- दुलार का विरोध करती है और ऐसी माँ को अनपरफेक्ट मदर का ...

असली श्रद्धांजलि

          जीवन वैसे ही चल रहा है। रोज के काम नियमित रूप से हो रहे हैं। कमी है तो पापा की। आज 2 तारीख को पापा का उठावना है, शाम को श्रद्धांजलि बैठक रखी गई है। मैं पापा के शौक कभी भूल नहीं सकता! सबेरे गाढ़े दूध की चाय पीना, अखबार किताबें पढ़ना, थोड़ी कसरत करना, नहा कर प्रेस के कपड़े पहनना और सोते समय एक गिलास दूध पीना। वे मुझे हमेशा कहा करते- 'कमाते हो, अच्छा खाओ, अच्छा पिओ, अच्छा पहनो, जीवन स्तर ऊँचा रहे, इसलिए शारीरिक- मानसिक कसरत करते रहो।' सुबह उठते ही मेरे हाथ में अखबार आया, तारीख पर ध्यान गया। मुँह से निकला- "निर्मला, बहुत बड़ी गलती हो गई। दूधवाले काका, प्रेस वाली अम्मा, अखबार वाले भैया को पिछले महीने के रुपये नहीं दिए। अभी तीनों के रुपए निकाल दो। उन्हें फोन करके बुला लेता हूँ।" पास खड़े चाचा जी सुन रहे थे, बोले- "अरे इसमें गलती कैसी? आज उठावना हो जाय फिर हिसाब कर देना।"           "नहीं, चाचाजी। पापा इन तीनों की बहुत इज्जत करते थे। हम दोनों वर्किंग हैं, कई बार हम दोनों को बाहर जाना पड़ता था। गर्मी, सर्दी, बरसात कैसा भी समय रहा हो, ये तीनों ...