सिया और राघव के विवाह को 6 महीने हो गए। सिया को याद नहीं, दोनों साथ में कभी मॉर्निंग वॉक को गए हों या रात में टहलने को। अमूमन डिनर के बाद कई जोड़े बाग- बगीचे में टहलते दिख ही जाते हैं। सिया कई बार इच्छा जाहिर कर चुकी, पर राघव पर कोई असर नहीं। सिया ने सोच लिया- आज तो राघव से बात करनी होगी-" तुम रोज सुबह-शाम 2-2 घंटे क्लब में जाते हो, आज मैं भी चलूंगी तुम्हारे साथ।" "क्यों, मैंने कल तुम्हें रुपए दिए थे, जाओ, शॉपिंग कर आओ।" "हर चौथे दिन नए कपड़े, कॉस्मेटिक्स खरीदने का क्या फायदा, जब कहीं जाना ही नहीं !" "किसने कहा तुम घर बैठी रहो, अपनी सहेलियों के साथ समय बिताओ। भैया- भाभी, बच्चों के साथ घूमो।" "पर मुझे तुम्हारे साथ घूमना है।" "तुम जानती हो- मैं सुबह शाम क्लब जाता हूँ और दिन में फैक्टरी।" "तो आज मैं भी क्लब चलती हूँ।" "नहीं, वहाँ सब तरह के लोग आते हैं, तुम्हारा जाना सही नहीं।" "वे सब तुम्हारे दोस्त ही हैं ना! कइयों की तो पत्नियां भी आती होंगी।" "तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! वे शराब पीती हैं...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !