जरूरत नहीं उम्र को ढंक दूँ खिजाब से, रिश्तों की गहराई नापी है मैंने उम्र से। किसी प्याले की कुव्वत कहाँ बहका सके मुझे, धुन है, जज्बा है-प्यार का,जिसने बाँधा मुझे। क्यों कर गुजारें जवानी मयखानों में, खो देते होश-हवास, जब डूब जाते नशे में। परिवार तबाह करता यह जुए का नशा, दीवानगी दिखाती दौलत,शोहरत का नशा। नशा है स्मार्टफोन पर जुटे रहने का, नशा है घंटों बतियाते रहने का । नशा है लोगों के लाइक्स देख हर्षाने का , नशा है चेटिंग का , फ्लेर्टिंग का। रिश्ते का जुनून हो नशा हो प्यार में, धन-मन समर्पित हो , ऐसा नशा हो संसार में, मंदिर-मस्जिद,धर्म-जात के नाम पे न लड़े इंसान, ढोंगी बाबा और नेताओं बंद करो देना अपना ज्ञान।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !