Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2017

तीर्थयात्रा

                                    सारी तैयारी हो चुकी है | सुनील और रवीना कल यात्रा के लिए रवाना हो जायेंगे | इनके हमउम्रों का ग्रुप चारों धाम की तीर्थ यात्रा सुनियोजित कर चुका है | मौक़ा अच्छा है - ये दोनों भी शामिल हो रहे हैं | हर वर्ष कुछ दिनों के लिए अपने गाँव के पुश्तैनी घर रह आते थे | माँ और पिताजी वहीँ रहते हैं | गाँव में पड़ोस के परिवार काफी मिलनसार और सहयोगी हैं - सो उन दोनों को किसी तरह की परेशानी नहीं होती है | इस बार रवीना ने तय कर ही लिया था कि गाँव नहीं  जायेंगे , छुट्टियाँ कहीं और बिताएंगे |                                      रात में सुनील सूटकेस बंद कर ही रहा था , उसके मोबाइल पर घंटी बजी | दूसरी तरफ सुनील के पिता ही थे- " बेटे सुनील , तुम्हारी माँ की तबियत अचानक बिगड़ गई है | मैं अस्पताल ले कर आ गया हूँ | तुम दोनों भी तुरंत आ जाओ | " " पर पिताजी , हमारी तो तीरथ की टिकटें करी हुई ह...

स्मृतियाँ

स्मृतियाँ की मंजूषा में हैं मोती  अनगिनत, मोती टूटे नहीं , छूटे नहीं | अम्मा के मुकलावे का वो पीढा , बाबा की चांदी के मूठ वाली छड़ी | माँ के हाथ की जाकेट , पिताजी का प्यार भरा आशीष | मजबूत शख्सियतों की बोलती निशानियाँ हैं , नहीं खोना चाहती उनके होने का आभास | आज भी यादों में कैद हैं हर लहमे , वे सिर पर हाथ रखते तो लगता , आसमान ने साया कर दिया | बिखरती सदा दुआओं की महक , साथ छूट गए , यादों के हिस्से बन गए | मैंने क्या हासिल किया ? दिन रात क्या बटोरती रही ? -जो विरासत छोड़ जाऊँगी !