* गैर को अपना बनाने की अदा जाती रही , दिल की महफिल को सजाने की अदा जाती रही | कीमती कालीन जब से मेरे घर में आ गए , बेहिचक घर आने जाने की अदा जाती रही | बाथरूमों की नई कल्चर में ऐसा बंद हूँ , खुल के बारिश में नहाने की अदा जाती रही | वक्त ने कुछ ऐसे छीने प्यार के लम्हे , रूठने की और मनाने की अदा जाती रही | * एक ही गलती , सारी उम्र करते रहे , धूल चेहरे पे थी , हम आइना साफ करते रहे | * सब चाहते हैं मंजिलें पाना चले बगैर , जन्नत भी सभी को चाहिए मरे बगैर | * हर शख्श दौड़ता है यहाँ भीड़ की तरफ , फिर ये भी चाहता है , उसे रास्ता मिले |
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !