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Showing posts from January, 2017

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

सीख

                                             दीनदयाल की दिनचर्या बड़ी शिथिल हो गई है | रिटायरमेंट में करने को कुछ नहीं | जब - तब खिड़की के पास कुर्सी डाल कर बैठ जाते हैं | सामने आम के पेड़ पर इनकी निगाहें टिकी हुई है | कई दिनों से देख रहे हैं - एक चिड़िया घोंसला बनाने में जुटी है | तीन डालों के संगम पर कुछ तिनके टिकाकर उस पर घोंसला बनाना - अनोखी कारीगरी ही है | एक - एक तिनका चुनकर चोंच में दबाकर लाना - एक साधना से कम नहीं | वे देख रहे हैं - कई बार चिड़िया कुछ तिनकों को फेंकती भी जाती है , शायद नाप - तोल में कमी रह जाती होगी | कभी धागे , कभी कपड़े की बारीक चिंदी उठा लाई | घर बुनना और चुनना - सभी काम चोंच से ही कर रही है | यह घोंसला बनाने वाली चिड़िया और कोई नहीं -  एक होने वाली माँ है -जो अपने आने वाले बच्चे के लिए महल बना रही है | दीनदयाल सोच रहे हैं - यह खुद के लिए तो कभी घर नहीं बनाती | यह बसाहट सिर्फ बच्चों के लिए |                ...

ख़ुशी

                                                                      काफी दिनों बाद दोनों बच्चे हॉस्टल से घर आ रहे हैं | स्मिता बहुत खुश है | सुरेश एक छोटे शहर में नौकरी करते  हैं | यहाँ शिक्षा की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण बच्चों को दूसरे शहर के नामी हॉस्टल में डाल दिया | गर्मी की छुट्टियाँ हो रही हैं | कमर में साड़ी के पल्लू को खोंस कर स्मिता के सधे हुए हाथ एक कुशल रसोइये की तरह कभी एक कड़ाही में चल जाते तो कभी दूसरी कड़ाही में ..| गैस के चारों चूल्हों पर रखे  बर्तनों पर क्रमशः दौड़ती नजर उसके कुशल पाक-दक्ष होने का परिचय दे रही है |  कुछ ही देर में विभिन्न व्यंजनों की महक से पूरा घर महक गया | आज दोनों कड़ाही भी बहुत प्रसन्न हैं - लजीज व्यंजनों से लबालब जो हैं |                                       ...

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ 

अच्छे दिन ........आएंगे

लो , एक वर्ष और बीत गया , उम्र में एक अंक और बढ़ गया | सन्  2017 का हुआ शंखनाद , नववर्ष हुआ है आगाज | मैं हाथ जोड़ कर रही हूँ प्रार्थना , प्रभु , सुन लो मेरी अरज | मेरा भारत सदा रहे महान , आमजन का बना रहे स्वाभिमान | भूखे को रोटी मिले , प्यासे को पानी मिले | ये बाते हुई बड़ी पुरानी , अब तो समस्याएं जटिल नई | सुनहरे भारत का है एक सपना , गाँव -गाँव साक्षरता - अभियान चले | शिक्षा ऐसी जो दे सीखने के अवसर , हर युवा को मुहैय्या हो रोजगार | पग - पग पर है जीवन में संकट , रेल यात्रा भी नहीं रही सुरक्षित | प्रभु , यात्री - सुरक्षा पर दिला दो ध्यान , जिस से घर-परिवार सदा रहे तनाव मुक्त | यहाँ अस्पताल है खुद बीमार , यह कैसे सुने हमारी गुहार | प्रभु , इन्हें ही बनाओ निरोग , जिस से हो रोगों की रोकथाम नोटबंदी ने मचाया बड़ा दंगल , ' कैशलेश ' बनी मृगमरीचिका | हे प्रभु , भ्रष्टाचार का हो समापन , सुकून भरा हो जीवन - यापन | खातों में हैं रुपये पड़े हुए , पर पाने को हम तरस रहे | प्रभु , कतारें करवा दो कुछ छोटी , रकम दिलवा दो कुछ मोटी | प्रभु, दिवा - स्वप्न नहीं म...