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Showing posts from August, 2018

प्रेम-पथिक

चाहती हूं, सदा बनी रहूँ प्रेम-पथिक, बरसा दूँ प्रीत, बन प्रेम -प्रतीक। उलाहने सुन उदास हो जाता मन मेरा, जब सपने सजते नयनों में, खिलता दिल मेरा। यहाँ न कोई संगी, न कोई साथी, पथरीली राहों पर हूँ भटक जाती। अड़चनें बढ़ाती यह कायनात, थमे मेरे कदम, इन्हें तुच्छ मान, लक्ष्य की आस में बढ़ी हरदम। चाहे ठोकरों से मैं हो जाऊं बेहाल, मुश्किलें हो हजार, जिंदगी हो मुहाल। गहरे सन्नाटे हो या हो अंधेरा, राह पर, अकेले ही चलना होता है जीवन-पथ पर। साथ जगत में है पल दो पल, बस, प्यार बाँटती बढ़ती चल। करती चल एक निर्माण नवल, निर्बल, दीन जनों की बन जा संबल। विश्राम कहाँ? प्रेम की डगर ली थाम, न पूछो, मेरा नाम, मेरा गाँव, मेरा धाम। न मैं हूँ हिन्दू , न मैं मुसलमान , प्रेम-पथिक हूँ-यही मेरी पहचान।

72वीं वर्षगांठ

          कल ही पड़ोसी मिश्रा जी मिल गए। मैराथन से लौटे थे। उनके जोश और जुनून के आगे मैं नतमस्तक हो गई। पूछ ही लिया- 'मिश्रा जी , आप कितने वर्ष के हो ?' बोले-' स्वतंत्र भारत की और मेरी उम्र बराबर ही है।' मैं मुस्करा उठी- 'बहत्तर वर्ष, वाह।'           72 वर्ष-बहुत कुछ हासिल करने के लिए एक लंबा अंतराल। हमने क्या हासिल किया? हम अंग्रेजों से 72 वर्ष पूर्व आजाद हो गए, पर क्या जातिगत भेदभाव, रिजर्वेशन, धर्म के नाम पर राजनीति, लिंग आधारित भेदभाव से हम आजाद हो पाए हैं?           15 अगस्त आ गया, सोशल मीडिया पर देशप्रेम के भावपूर्ण संदेश प्रसारित होंगे। अगस्त और जनवरी माह में ही हमारे भीतर देशप्रेम की भावना क्यों हिचकोले खाती है? देशप्रेम तो एक दायित्वबोध है। जिस तरह हमारे परिवार के लिए दायित्वबोध होता है, उसी प्रकार देश के लिए भी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। हमारे भीतर यह वैचारिक समझ होनी चाहिए कि धर्म, जाति और समुदाय से परे हम भारतीय हैं । स्वतंत्रता से तात्पर्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत...