नए साल का पहला दिन 365 पृष्ठों की कोरी किताब के पहले पन्ने के समान है। नकारात्मकता को त्यागकर पन्ने की शुरुआत सकारात्मक कदमों से हो, तो वर्ष भर खुशियां झोली में भरती रहेंगी। अच्छी सोच और विचारों के साथ की गई हर कोशिश जीवन का नजरिया ही बदल देती है। हो सकता है- छोटी छोटी कोशिशें एक बड़े बदलाव की नींव मजबूत कर जाए। बीते वर्ष मेरे मन में कई इच्छाएं जागीं, मेरी महत्वकांक्षाओं ने चूहे की भांति बिल से मुंह निकाला, पर बिल्ली रानी के पदचापों के आभास मात्र से....दुबक गई। आज गौर करती हूं, तो पाती हूँ-बिल्ली की आहट तो एक बहाना थी। मैं ही अकर्मण्य रही-मेरी महत्वाकांक्षा तो मात्र एक वैचारिक आकांक्षा थी। हर नई शुरुआत दुआओं के साए में हो, हम महफूज रहें- यह बड़ी चुनौती बन गई है। जाति, धर्म, गो-सेवा को ले कर आए दिन हो रही हिंसा ताईद करती है कि लोगों को कानून हाथ में लेने की छूट मिल गई है। भारत एक मूढ़ धार्मिक हिंसा की तरफ बढ़ने वाला देश बनता जा रहा है, फिर भला दिन मंगलमय कैसे हो ? ...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !