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Showing posts from 2018

मंगलमय शुरुआत

          नए साल का पहला दिन 365 पृष्ठों की कोरी किताब के पहले पन्ने के समान है। नकारात्मकता को त्यागकर पन्ने की शुरुआत सकारात्मक कदमों से हो, तो वर्ष भर खुशियां झोली में भरती रहेंगी। अच्छी सोच और विचारों के साथ की गई हर कोशिश जीवन का नजरिया ही बदल देती है। हो सकता है- छोटी छोटी कोशिशें एक बड़े बदलाव की नींव मजबूत कर जाए।           बीते वर्ष मेरे मन में कई इच्छाएं जागीं, मेरी महत्वकांक्षाओं ने चूहे की भांति बिल से मुंह निकाला, पर बिल्ली रानी के पदचापों के आभास मात्र से....दुबक गई। आज गौर करती हूं, तो पाती हूँ-बिल्ली की आहट तो एक बहाना थी। मैं ही अकर्मण्य रही-मेरी महत्वाकांक्षा तो मात्र एक वैचारिक आकांक्षा थी।           हर नई शुरुआत दुआओं के साए में हो, हम महफूज रहें- यह बड़ी चुनौती बन गई है। जाति, धर्म, गो-सेवा को ले कर आए दिन हो रही हिंसा ताईद करती है कि लोगों को कानून हाथ में लेने की छूट मिल गई है। भारत एक मूढ़ धार्मिक हिंसा की तरफ बढ़ने वाला देश बनता जा रहा है, फिर भला दिन मंगलमय कैसे हो ?      ...

वटवृक्ष

          इंसान के दिमाग की सुरंग बहुत लंबी हुआ करती है, उसमें बेशुमार लड़खड़ाते अल्फाज़, दुःख भरे चलचित्र चलते रहते हैं। आसपास में कोई सुनने वाला हो या ना हो, पर वे शब्द खुद को ही सुनाई देते रहते हैं। यही स्थिति है-नब्बे वर्षीया रामप्यारी की। आसमान वाले से शिकायत भरे लहजे में इल्तिजा कर रही है, बड़बड़ा रही है-' इत्ती लंबी उमर कोई को ना देना। उमर छोटी हो पर चैन-सुकून की हो। मैंने क्या पाया? 20 वर्ष पहले पति का देहांत हुआ तो लगा-जीवन संध्या का अंतिम अध्याय आ गया। पर बेटे के परिवार के बीच जीवन के दिन सुकून से निकलते गए। 6 वर्ष पूर्व बेटा गुजर गया। सख्त जमीन पर चलते-चलते तलवे भी सुन्न हो जाते हैं, एक मां का जीवन तो नीरस होना ही था। ऐसे में अपनी साँसों को निबाहना अपनी मजबूरी होती है। अब....हे प्रभु, यह धरती फट क्यों नहीं जाती? कल एक सड़क दुर्घटना में जवान पोता चला गया। यह दुःख भी इन बूढ़ी आंखों के आगे !             अचानक रामप्यारी को कोमल हाथों का स्पर्श हुआ, मानो तपती धरती पर शीतल जल के छींटे गिरे हों। रामप्यारी का 5वर्षीय पड़पोता गोदी में आ...

क्या ये बदलाव अच्छे हैं?

आज राह चलते-चलते बदलते हैं मंजर, कैसा आ गया है एक तूफानी बदलाव ! थम गए हैं मेरे कदम, लिए प्रश्न कई भीतर, क्यों न मैं बदल सकी, रह गई अकेली। समय के पृष्ठ पर लिखी इबारतें, त्वरित गति से हो रहीं अदृश्य। है चुनौती, इन इबारतों को हम पढ़ लें, क्योंकि परिवर्तन का डस्टर है बड़ा गतिमान। अतीत में जीना, जैसे पुराना नोट भुनाना, लाख कर लें कोशिश, चल नहीं सकता। बड़े कहें-भविष्य की कल्पना में मत फँसो, जीवन तो नगद है, उधार नहीं। 'यूज़ एन्ड थ्रो' की अवधारणा, भागमभाग और इंस्टेंट पाने की चाहत, अंगूठे दे रहे 'लाइक्स' और 'थम्स अप', और प्रतिक्रियाएं बदल रहीं हैं भावना। दुर्घटनाओं के बन मूक दर्शक वीडियो बना, कर रहे वायरल। अभिव्यक्त का तरीका हुआ अनूठा, व्यवहार और अहसासों के मूल्य गए बिखर। सिसकती मानवता, सोता समाज, शिकायत करें तो किससे और कैसे ? तकनीक और तरक्की की दौड़ में, इंसानियत का अर्थ ही न बदल जाए !

समरसता भोज

            राजनीति अपनी अनुकूलता तलाशने के लिए जानी जाती है। इस समय चुनावी सरगर्मी रफ्तार ले चुकी है। सभी राजनीति दल व नेता हर जाति वर्ग को रिझाने में कोई कमी नहीं रख रहे हैं। दलित वर्ग को अपनी ओर करने के लिए सबसे ज्यादा उनके हित में काम करने वाली पार्टी की छवि बनाने के लिए उठापटक हो रही है। उनके साथ भोजन करना, उनके कंधों पर हाथ रख कर आत्मीयता दिखाना, उनके साथ फोटो खिंचवाना-राजनैतिक दांवपेंच ही तो है। दलितों में अपनी पैठ को बढ़ाने के लिए सामाजिक समरसता कार्यक्रमों का आयोजन जोर शोर से हो रहा है।             नेताजी ने कलेक्टर के द्वारा दलितों की बस्ती की जानकारी ली। तय हुआ- उनकी बस्ती में 'समरसता भोज' रखा जाय। हरिया जाटव का घर दलित मोहल्ले के बींचों बीच में है, वहीं भोजन किया जाय, इससे पूरा मोहल्ला कवर हो जाएगा। दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए खेती द्वारा मशक्कत करने वाले हरिया के परिवार मे -पत्नी और दो बच्चे। सप्ताह भर पहले हरिया को सूचित कर दिया गया- 'नेताजी तुम्हारे घर भोजन करेंगे।' अपने ही परिवार का पेट भरने में असमर्थ हरिया...

इति

            मैं ' इति '-जनार्दन जी की तीसरी पुत्री | मेरी दो बड़ी बहनें - रीमा और श्यामा | छोटे शहर में एक साधारण परिवार- जो कि अपने निर्णय कम ही ले पाता  है, परन्तु दूसरों की आलोचनाओं से विचलित जरुर होता है | दो पुत्रियाँ होने के बाद कुलदीपक के आस में  तीसरी और आखिरी असफल प्रयत्न के रूप में -मैं | इसीलिए पिताजी ने मेरा नाम रखा - 'इति' अर्थात्- समाप्ति , फुलस्टॉप | इसके अलावा रिश्तेदारों के सहानुभूति पूर्ण अटपटे वाक्यों के कारण मेरा परिचय एक अवांछित और अनुपयोगी प्राणी के रूप में होने लगा , जो कि मुझे कदापि बर्दाश्त नहीं था |         जब से मैंने होश संभाला - अपने नाम  का अर्थ ही बदल लिया | इति मतलब नकारात्मक विचारों की समाप्ति , समस्याओं का अंत | स्वाभाविक है हर समस्या सहजता से हल नहीं होती , कभी कभी बगावत भी करनी पड़ती है | बचपन से दो ही शौक रहे - पढ़ाई और खुद को उपयोगी साबित करने का जूनून | घर में पढ़ाई का माहौल था नहीं | माँ की शिक्षा थी - तुम्हें दूसरे घर जाना है, सो गृहकार्यों में दक्ष होना जरुरी है | लड़कियों की डिग्री क...

प्रेम-पथिक

चाहती हूं, सदा बनी रहूँ प्रेम-पथिक, बरसा दूँ प्रीत, बन प्रेम -प्रतीक। उलाहने सुन उदास हो जाता मन मेरा, जब सपने सजते नयनों में, खिलता दिल मेरा। यहाँ न कोई संगी, न कोई साथी, पथरीली राहों पर हूँ भटक जाती। अड़चनें बढ़ाती यह कायनात, थमे मेरे कदम, इन्हें तुच्छ मान, लक्ष्य की आस में बढ़ी हरदम। चाहे ठोकरों से मैं हो जाऊं बेहाल, मुश्किलें हो हजार, जिंदगी हो मुहाल। गहरे सन्नाटे हो या हो अंधेरा, राह पर, अकेले ही चलना होता है जीवन-पथ पर। साथ जगत में है पल दो पल, बस, प्यार बाँटती बढ़ती चल। करती चल एक निर्माण नवल, निर्बल, दीन जनों की बन जा संबल। विश्राम कहाँ? प्रेम की डगर ली थाम, न पूछो, मेरा नाम, मेरा गाँव, मेरा धाम। न मैं हूँ हिन्दू , न मैं मुसलमान , प्रेम-पथिक हूँ-यही मेरी पहचान।

72वीं वर्षगांठ

          कल ही पड़ोसी मिश्रा जी मिल गए। मैराथन से लौटे थे। उनके जोश और जुनून के आगे मैं नतमस्तक हो गई। पूछ ही लिया- 'मिश्रा जी , आप कितने वर्ष के हो ?' बोले-' स्वतंत्र भारत की और मेरी उम्र बराबर ही है।' मैं मुस्करा उठी- 'बहत्तर वर्ष, वाह।'           72 वर्ष-बहुत कुछ हासिल करने के लिए एक लंबा अंतराल। हमने क्या हासिल किया? हम अंग्रेजों से 72 वर्ष पूर्व आजाद हो गए, पर क्या जातिगत भेदभाव, रिजर्वेशन, धर्म के नाम पर राजनीति, लिंग आधारित भेदभाव से हम आजाद हो पाए हैं?           15 अगस्त आ गया, सोशल मीडिया पर देशप्रेम के भावपूर्ण संदेश प्रसारित होंगे। अगस्त और जनवरी माह में ही हमारे भीतर देशप्रेम की भावना क्यों हिचकोले खाती है? देशप्रेम तो एक दायित्वबोध है। जिस तरह हमारे परिवार के लिए दायित्वबोध होता है, उसी प्रकार देश के लिए भी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। हमारे भीतर यह वैचारिक समझ होनी चाहिए कि धर्म, जाति और समुदाय से परे हम भारतीय हैं । स्वतंत्रता से तात्पर्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत...

बातें छोटी छोटी

          कल सुमि कह गए थी-' आंटी, कल हमारे यहां सत्संग ग्रुप घर पर आएगा। मम्मी ने कहा है आप भी आ जाना।' मैंने पूछ ही लिया-'क्या कल तुम्हारे घर सत्संग होगा ?' ' अरे नहीं, वो क्या है, कई दिनों से दादी बीमार हैं, तो मम्मी सत्संग में नहीं जा पा रही हैं। वे सब दादी को देखने आ रही हैं।,           हमारे घर से कुछ दूरी पर एक घर में सत्संग हुआ करता है। घर की मुखिया शकुंतला देवी काफी सुलझे और सौम्य विचारों की हैं। वे ही जीवन से सम्बंधित बातों पर, पौराणिक कथाओं पर चर्चा करती हैं और महिलाएं 2-3भजन गा लेती हैं। रोज सुबह 11से 12 के बीच यह सत्संग होता है। सुमि की मां वर्मा भाभीजी से मेरी दोस्ती पुरानी है। मैं सत्संग में तो नहीं जा पाती हूँ, पर भाभीजी के द्वारा वहां उल्लेख किए प्रसंग सुन लेती हूं।           करीब सवा बारह बजे 20-22 महिलाएं घर के बाहर खड़ी थी, उनमें शकुंतला जी भी थी। शकुंतला जी ने घर के बाहर एक किनारे पर चप्पल उतारी, पर किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। सब महिलाएं दरवाजे पर ही चप्पल पटकती हुई घर के अंदर आ गई। शकु...

मुक्ति

           घर के द्वार पर आज पुनः तुम भिक्षुक बने खड़े हो। कल भी तुम आए थे। दरवाजे को जरा सा खोलते ही मैंने तुम्हें देखा, तुरंत दरवाजा बंद कर लिया था और चिल्ला पड़ी थी -' यहां से चले जाओ। ' तुम दरवाजा पीटते रहे-' सुमन, मैं शर्मिंदा हूँ, मुझे माफ़ कर दो।' मैं स्तब्ध थी। तुम्हें द्वार पर खड़ा देख आज भी स्तब्ध हूँ। 20 वर्षों बाद तुम्हारा मेरे सामने आना-मेरी आँखों से आंसू रुक नहीं रहे।           याद हो आया वह दिन जब तुम्हारे साथ मेरी शादी हुई थी। तुम अपने परिवार के इकलौते बेटे और मैं अपने माँ-बाप की इकलौती संतान। वह दिन भी नहीं भूली-शादी के पांच वर्ष बाद जब तुम साधुओं की टोली में शामिल हो गए। मुझे बताए बिना चले गए। एक कागज का पुर्जा लिख गए-' सुमन , मुझे माफ़ कर देना। मैं गृहस्थ जीवन में बंधना नहीं चाहता।' गृहस्थ जीवन एक बंधन है, इसकी अनुभूति तुम्हें पांच वर्ष बाद हुई जब कि हमारा परिवार बढ़ चुका था-एक बिटिया हो गई। यह एक छोटा सा पुर्जा नहीं, मेरे लिए आग का गोला था। एक कागज से सारे संबंधों का पटाक्षेप ? सारे रिश्तों की धज्जियाँ उड़ गई। मुझसे क...

अमरूदों वाला मकान

          देखते ही देखते चित्रों में बड़ा अंतर आ गया है। मेरा आठ वर्षीय पोता प्रकृति का चित्र बना रहा है। जिसने प्रकृति के दृश्य तो नाम मात्र चित्रित किये हैं। घर के आगे कार, दोपहिया वाहन बना दिए, कुछ गमले खड़े कर दिए, आसमान में उड़ता हवाई जहाज बना दिया और आसपास मकानों के जमघट। मुझे अपने दिन याद हो आए। मैं प्रकृति का चित्र बनाता था- घर, चौबारा, अमरूद का पेड़, बावड़ी, नदी, दो लकीरों से पहाड़ और उस पर झाँकता हुआ लाल सूर्य, रुई जैसे गोल-गोल बादल, पक्षियों के साथ मोर भी बना देता था। मेरे दोनों बेटों की चित्रकला भी अच्छी ही थी। वे प्रकृति का दृश्य अलग ही बनाते थे। उनकी तस्वीर में खेत घट गए, घरों के आगे रास्ते बन गए, नदी थोड़ी दुबली हो गई, पेड़ कम हो गए। आकाश में पक्षी भी प्रतीकात्मक रूप में ही उड़ते दिखाई दिए। आज पोते की चित्रकला देख कर यह तो सत्य हो गया कि जो चीजें आसपास ही न हों, वे ख्यालों से भी दूर होती जाती हैं, उनका चित्र भी बनाना मुश्किल होता है। गेँहू, ईख के खेत, नदी, बावड़ी-यह पीढ़ी क्या जाने ?           हमारा मकान दादाजी ने बनवाया था। घर के ...

मृगतृष्णा

माटी का तन, हर पल लिखे एक नई कहानी, जग मिथ्या, केवल जन्म-मरण की निशानी। आकुल-व्याकुल मन कभी न स्थिर रह पाता है, सपनों की रुनझुन में ही जीवन कट जाता है। ऊपर से संतोष दिखा, फिर भी अंतर प्यासा है, मृगतृष्णा के जाल में फंसा मन घबराता है। सागर में रह कर भी प्यास नहीं बुझती पूरी, जैसे मृग ढूंढता है , जंगल में कस्तूरी। तमाम उन परछाइयों के पीछे हम भाग रहे, प्यास बुझाने को हैं असफल हो रहे। शहर की भागमभाग, जीवन का जंजाल, दूर-दूर तक फैला है, मरीचिका का जाल। जाने कैसी ये मृगतृष्णा, अखंड सुख के चाहत की, हर बार यही सोचा करती, लूँगी अब साँस राहत की। बस , यह आखिरी साध पूर्ण हो जाए , हे प्रभु, मेरी चाहतों पर विराम लग जाए ! पर, फिर एक नई चाह जग जाती, ऐसी अनंत चाहतों के जंजीर में मैं फंस जाती। क्या इन जरूरतों की धूप कभी ढलेगी ? पता नहीं , यह मृगतृष्णा कब तक छलेगी ?

सांध्य-वेला

          देवीलाल को अपने मकान के लॉन में बैठना बहुत पसंद है । सड़क पर आते जाते लोग दिखते रहते हैं। परिचितों से राम-रामी हो जाया करती है। यहीं से मकान के ऊपरी हिस्से में रह रहे किरायेदार की बच्ची की चुहलबाजी कानों में पड़ती रहती है। पांच वर्षों से सचिन और सारिका किरायेदार के रूप में रह रहे हैं। दोनों सरल और सहायक स्वभाव के युवा दंपत्ति हैं , 3 वर्ष की बच्ची है। देवीलाल को इन्हें कभी किसी बात के लिए टोकना नहीं पड़ा। पिछले वर्ष पत्नी रुक्मणी का देहांत हुआ , तब से देवीलाल बहुत अकेले पड़ गए। इन दोनों ने ही संभाला। बेटा राजेश और बहू तो दो ही दिन रुके। पत्नी का 50 वर्ष का साथ छूटा, देवीलाल के लिए एकाकी जीवन काटना दूभर हो गया था। आहत जीवन को सहारा देने के बजाय राजेश छोड़कर चला गया। भला हो सचिन सारिका का, 'बाबूजी-बाबूजी' कह-कह कर आस पास ही रहे, हमदर्द और सेवा से ओतप्रोत रहे।           फोन की घंटी बजी। देवीलाल ने फोन उठाया, उस तरफ राजेश ही था- "पापा कैसे हो?" "ठीक हूँ।" "पापा, माँ के जाने के बाद इतने बड़े मकान में मन कैसे लगता होगा! क्यों न आप वहाँ...

बेबसी

          "मां , छुट्टियाँ शुरू हो गई, सेठ जी की बेटी कब आएगी ? जाते वक्त अपने बच्चों के कपड़े , किताबें मुझे दे जाती हैं । मुझे बहुत अच्छा लगता है ।" सीता -" नहीं, इस वर्ष छुट्टियों में उनकी बेटी नहीं आएगी। सेठ जी का परिवार ही उनके पास जा रहा है-दो महीने के लिए। " माँ-बेटी की बातें रामेश्वर सुन रहा था, सकपका गया-"तो क्या 2 महीने उनके घर पर कोई नहीं रहेगा ?" घड़ी की ओर देखते हुए सीता ने लक्ष्मी को स्कूल जाने के लिए कहा । सीता -" हाँ, सेठानी जी ने कहा है-2 महीने घर बंद रहेगा, तो कामह भी नहीं रहेगा। वे उन 2महीनों की तनख्वाह भी नहीं देंगी।" "सीता, इस तरह तो बहुत परेशानी हो जाएगी। हम गरीबों के तो तनख्वाह पर खर्चे बंधे होते हैं। हमें बजट बना कर तय करना होता है- कहाँ कटौती करके किस आवश्यकता को पूरा किया जाय ! जरूरी खर्चे तो रुकेंगे नही, भले कर्ज ही लिया जाय!" "लक्ष्मी के बापू, कल सेठजी का बेटा 50 हजार का मोबाइल लाया, बोला-जीजी के पास जाऊंगा, नया मोबाइल चाहिए। सेठानी जी ने अपने लिये, बेटी के लिए , उसके बच्चों के लिए महंगे कपड़े और कीमत...

दायरा

वो एक अल्हड़ कमसिन उम्र ही तो थी, रोज एक नए सपने में मैं खो जाती । अपनी बाहें फैला घूमने लगती , आकाश को अपने घेरे के अंदर पाती । उमंगों से भर नाचने लगती जिंदगी , मर्यादा के फ्रेम में जकड़ी ये जिंदगी । दादी की टोका-टाकी, एक बवंडर मचाती , माँ बस सीमित दायरे को ही समझाती । आज भी मां के आशा -आशयों को ही मथ रही , उनके मार्फत अपने अस्तित्व को ही खोज रही , छटपटाती हूँ क्योंकि दायरा है सीमित , न कर सकी अपने वजूद को परिभाषित । माँ हूँ , संतानों को किया मैंने पूर्ण सिंचित , लेकिन पिता तुल्य कुछ भी देने से हूँ वंचित । कुल-गोत्र का नाम नहीं मैं दे सकी , साहस के साथ बैसाखियाँ न तोड़ सकी । क्यों रहना पड़ता है हमें दायरे के भीतर , उलझनें तो नहीं आती, सोच के दायरे के भीतर । रह जाती हैं लबों पर तबस्सुम आंखों में नीर , भीतर के स्त्रीत्व को नेपथ्य में किया स्वीकार। यह समाज क्यों बनाता है दायरा , करनी होगी जद्दोजहद, न कोई आसरा । कब तक सहेंगे ये हाशिये की पीड़ा ? ये पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियां ?

सुलोचना जी

                        कल की ही बात है। मैं बाजार से घर आ रही थी । मोहल्ले के बच्चों को सड़क पर क्रिकेट खेलते देखा । मेरी चाल धीमी हो गई, क्योंकि इन बच्चों के बीच सुलोचना जी भी थी । वे साड़ी के पल्ले को कसकर, पटलियों को ऊंचा कर कमर में खोंसे हुए एक खिलाड़ी की मुद्रा में खड़ी थी । बच्चों के बीच बेटिंग करती हुई एक नवयुवती थी । जब उसने मेरे पैर छुए, तो याद हो आया -यह तो सुलोचना जी की बहू है । कुछ महीने पूर्व ही बेटे अनिल की शादी हुई है । अनिल गुड़गांव नौकरी करता है । यहां सास -बहू रहती हैं । मैनें सुलोचना जी को नमस्कार किया , वे कहने लगी- "बहू बच्चों के साथ खेलना चाहती थी, तो मैं भी शामिल हो गई ।" कहने को तो सुलोचना जी का वाक्य साधारण ही था, पर इस वाक्य से वे बहुत कुछ कह गए थी । बहू के प्रति उनके उदारवादी विचारों के सामने मैं नतमस्तक हो गई।             मैं सुलोचना जी को कई वर्षों से जानती हूँ । अल्पायु में ही इनके पति का देहांत हो गया । निजी मकान और बेटे की पढ़ाई के कारण ये जयपुर में ही बस गई । जिंदगी भ...

लघुकथा -आशा

            अगले महीने दिव्या के भाई की शादी इसी शहर में है । वह देवेंद्र से कई बार कह चुकी-" मुझे एक नई साड़ी दिला दो । मैं नहीं चाहती, शादी में पुरानी साड़ी पहनूँ ।" ऐसा नहीं था -देवेंद्र का हाथ तंग था । घर में इस बात का कई बार जिक्र हो चुका था। 20 वर्षीय बेटा अंशुल भी अपनी मम्मी की फरमाइश सुन चुका था ।               आज देवेंद्र ने घर आ कर दिव्या को एक पैकेट पकड़ाया । दिव्या की आँखें चमकी । उसने पैकेट लेते हुए कुछ पूछना चाहा, उससे पहले ही देवेंद्र बोल पड़ा -" माँ के लिए एक साड़ी लाया हूँ । घर में मेहमान आते जाते रहेंगे । माँ पर यह साड़ी अच्छी लगेगी । तुम इसे फॉल लगा कर तैयार कर देना । हाँ, तुम अपनी साड़ी के लिए मुझ से रुपये ले लेना ।" अंशुल की निगाह पिता पर टिकी हुई है, वह स्तब्ध है, रोज की चर्चा के बारे में सोचने लगा । दिव्या को इस बात का क्षोभ नहीं है कि देवेंद्र उसके लिए साड़ी नहीं लाए। उसे यह सोच कर खुशी है कि एक बेटा अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता है। रिश्ते निभाने के संस्कार घर से ही मिलते हैं । अंशुल देख रहा है , समझेगा। द...

नशा

जरूरत नहीं उम्र को ढंक दूँ खिजाब से, रिश्तों की गहराई नापी है मैंने उम्र से। किसी प्याले की कुव्वत कहाँ बहका सके मुझे, धुन है, जज्बा है-प्यार का,जिसने बाँधा मुझे। क्यों कर गुजारें जवानी मयखानों में, खो देते होश-हवास, जब डूब जाते नशे में। परिवार तबाह करता यह जुए का नशा, दीवानगी दिखाती दौलत,शोहरत का नशा। नशा है स्मार्टफोन पर जुटे रहने का, नशा है घंटों बतियाते रहने का । नशा है लोगों के लाइक्स देख हर्षाने का , नशा है चेटिंग का , फ्लेर्टिंग का। रिश्ते का जुनून हो नशा हो प्यार में, धन-मन समर्पित हो , ऐसा नशा हो संसार में, मंदिर-मस्जिद,धर्म-जात के नाम पे न लड़े इंसान, ढोंगी बाबा और नेताओं बंद करो देना अपना ज्ञान।

लघु कथा - बाल मन

4 वर्षीया अंशु ,स्कूल की छुट्टी हो गई है , गेट के पास खड़ी है | आज उसे लेने दादी नहीं आई , मम्मी आई हैं | अंशु को दादी का साथ अच्छा लगता है - न रोक ,न टोक , न कोई बंदिशें , बस फरमाइश ही फरमाइश | प्रायः अंशु सड़क पर पड़े एक पत्थर को जूते से उछालती हुई घर तक ले आती है | कभी नाचती हुई चलती है , कभी पूरे रास्ते स्कूल के किस्से ही सुनाती रहती है , मानो वे दादी नहीं सहेली हों | उसकी बातों पर वे मुस्कराती रहती हैं , परन्तु मम्मा को तो अंशु की शैतानियों पर बहुत गुस्सा आता है , डांटती ही रहती हैं | मम्मी तो हर काम में नियम बना देती हैं , लकीरें खींच देती हैं , उसे पार करना मतलब गुनाहगार | आज तो अंशु को चुपचाप रहना होगा , सीधे-सीधे चलना होगा | अंशु ने पूछा-" मम्मा , आज दादी क्यों नहीं आई ?" " दादी डेंटिस्ट के गई हैं |" उसे याद हो आया, पहले भी एक बार दादी पापा के साथ डेंटिस्ट के गई थी | पापा कह रहे थे -' अम्मा के दांत हिल रहे है ,निकालने ही पड़ेंगे |' अंशु घर घुसी, घर में हलवा बनाने की खुशबू बड़ी अच्छी लग रही है| पिछली बार दादी डेंटिस्ट के गई थी तो मम्मा ने लापसी...

खुले पंख

अब खुल गए हैं पंख मेरे , अँधेरे में भी चमक रही हैं नजरें | चाहतों की उड़ान भरता बावला मन , धुंध के परे खुला आसमान | जूनून , ख्वाहिशें बन गई ताकत , उल्हानें नहीं करते अब आहत| चश्मा चढ़ा गोल्डन फ्रेम वाला , क्यों न आए चेहरे पर नूर भला | चाँदनी छा गई है बालों में , तजुर्बा ही मशविरा दे रहे तहजीब में | अहसासों और जज्बातों के रेले , खुबसूरत लम्हों के छोटे-छोटे मेले | कमी नहीं है भौतिक सुखों की , कमी खटकती है अपने दिल के टुकड़ों की | मोबाइल पर कुछ पल बात कर , खुश हो लेती हूँ -उन्हें देख कर | 'नानी-नानी'शब्द की गूंज सुनती हूँ , मैं खिल जाती हूँ चहक उठती हूँ | अब मैं अनुभवियों की श्रेणी में आती हूँ , पीढ़ियों के बीच सेतु बन जाती हूँ | प्रार्थना यही मंगलमय कार्यों की साक्षी बनूँ , ख्वाब यही सबके सुख दुःख में भागी बनूँ | बस , रिश्तों में प्रेम सदा गहरा हो , जाने कल जिंदगी में क्या लिखा हो ?

दान

जनवरी महीना है , जोरों की मावठ पड़ रही है | बर्फीली हवा सुई सी चुभ रही है | दोपहर की धूप में बैठना अच्छा ही लगता है | यूँ कहें - ११ बजे घर का सारा काम करके महिलाओं को धूप में बैठ कर गप्पें मारने का बड़ा इन्तजार रहता है | घर के बाहर कई खटिया पड़ी हैं | कोई पालक-मेथी संवारती , कोई मटर छीलती, तो कोई बुनाई करती | इन सब के बीच बैठ जाती काकी | आज भी एक - एक करके सभी अपने अपने घरों से आ गई | काकी तो धूप निकलते से ही बैठ गई | काकी के धोंक देकर सब अपने अपने काम ले कर बैठ गई | जमघट पूरा जम गया | काकी बोली -' बिनणीयों , इब के संक्रात पे तेरुंडा में के करोगा ? सावित्री , तू के चीज को दान करेगी ?" " काकी , पहल के साल तकिया का गिलाफ करी थी , अब के 14 चादरां करुँगी |" " सुमन , तू ? " " काकी, मैं पहल के साल 14 किलो गुड़ करी थी , इब के 14 नारियल करश्युं |" " चंपा , तू ?" " काकी , हाल तो सोची कोनी !" " रामारी , कद सोचेगी , दो दिन रहगा है संक्रात का | तने बेरो है संक्रात में...