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Showing posts from May, 2019

मृत्युभोज

            इनके जिगरी दोस्त विनोद का देहांत हो गया। दोनों ने साथ में पढ़ाई की और साथ में ही नौकरी की। मेरा और भाभीजी का रिश्ता भी दोस्ताना ही रहा। विनोद भाईसाहब अपने घर के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे। भाई साहब को हार्ट अटैक क्या आया, घर की छत ही उड़ गई। जब अपने करीबी के घर में गमी हो तो मन में हौल उठता है, मन बड़े असमंजस में रहता है, न ही घर में मन लगता है और न ही उस माहौल के लिए पैर उठते हैं।             अगले ही दिन विनोद भाईसाहब की बड़ी बहन और जीजाजी आ गए। मन को बड़ी राहत मिली कि भाभीजी के साथ दुःख बाँटने के लिए उनके घर का ही कोई सदस्य आया। तीन दिन माहौल गमगीन ही बना रहा। इधर-उधर की बातें करने से किसी का मन बहल जाता है, यह सोचना गलत है। जो दुःख में है, उसके लिए हर शब्द शोर है। भाभी निस्पन्द और निःशब्द ही बनी रही। जीजी और जीजाजी ही आने जाने वालों को संभालते रहे। चौथे दिन--भाईसाहब की असामयिक मृत्यु से जीजी इतनी जल्दी उबर जाएंगी-यह सोचा नहीं था। अड़ोसी-पड़ोसियों से चल रही उनकी फुफुसाहट से पता चला कि वे बाजारों की जानकारी ले रही हैं। इतने ...