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Showing posts from June, 2018

मुक्ति

           घर के द्वार पर आज पुनः तुम भिक्षुक बने खड़े हो। कल भी तुम आए थे। दरवाजे को जरा सा खोलते ही मैंने तुम्हें देखा, तुरंत दरवाजा बंद कर लिया था और चिल्ला पड़ी थी -' यहां से चले जाओ। ' तुम दरवाजा पीटते रहे-' सुमन, मैं शर्मिंदा हूँ, मुझे माफ़ कर दो।' मैं स्तब्ध थी। तुम्हें द्वार पर खड़ा देख आज भी स्तब्ध हूँ। 20 वर्षों बाद तुम्हारा मेरे सामने आना-मेरी आँखों से आंसू रुक नहीं रहे।           याद हो आया वह दिन जब तुम्हारे साथ मेरी शादी हुई थी। तुम अपने परिवार के इकलौते बेटे और मैं अपने माँ-बाप की इकलौती संतान। वह दिन भी नहीं भूली-शादी के पांच वर्ष बाद जब तुम साधुओं की टोली में शामिल हो गए। मुझे बताए बिना चले गए। एक कागज का पुर्जा लिख गए-' सुमन , मुझे माफ़ कर देना। मैं गृहस्थ जीवन में बंधना नहीं चाहता।' गृहस्थ जीवन एक बंधन है, इसकी अनुभूति तुम्हें पांच वर्ष बाद हुई जब कि हमारा परिवार बढ़ चुका था-एक बिटिया हो गई। यह एक छोटा सा पुर्जा नहीं, मेरे लिए आग का गोला था। एक कागज से सारे संबंधों का पटाक्षेप ? सारे रिश्तों की धज्जियाँ उड़ गई। मुझसे क...

अमरूदों वाला मकान

          देखते ही देखते चित्रों में बड़ा अंतर आ गया है। मेरा आठ वर्षीय पोता प्रकृति का चित्र बना रहा है। जिसने प्रकृति के दृश्य तो नाम मात्र चित्रित किये हैं। घर के आगे कार, दोपहिया वाहन बना दिए, कुछ गमले खड़े कर दिए, आसमान में उड़ता हवाई जहाज बना दिया और आसपास मकानों के जमघट। मुझे अपने दिन याद हो आए। मैं प्रकृति का चित्र बनाता था- घर, चौबारा, अमरूद का पेड़, बावड़ी, नदी, दो लकीरों से पहाड़ और उस पर झाँकता हुआ लाल सूर्य, रुई जैसे गोल-गोल बादल, पक्षियों के साथ मोर भी बना देता था। मेरे दोनों बेटों की चित्रकला भी अच्छी ही थी। वे प्रकृति का दृश्य अलग ही बनाते थे। उनकी तस्वीर में खेत घट गए, घरों के आगे रास्ते बन गए, नदी थोड़ी दुबली हो गई, पेड़ कम हो गए। आकाश में पक्षी भी प्रतीकात्मक रूप में ही उड़ते दिखाई दिए। आज पोते की चित्रकला देख कर यह तो सत्य हो गया कि जो चीजें आसपास ही न हों, वे ख्यालों से भी दूर होती जाती हैं, उनका चित्र भी बनाना मुश्किल होता है। गेँहू, ईख के खेत, नदी, बावड़ी-यह पीढ़ी क्या जाने ?           हमारा मकान दादाजी ने बनवाया था। घर के ...