उस दिन पड़ोसी से क्या हुई तकरार, उसने खड़ी कर दी दो ईंटों की दीवार। गर्दन टेढ़ी कर झाँकता रहा, मन रहा बैचेन। दो मकानों के बीच दीवार बना, कैसे मिल उसे चैन! कहते हैं दीवारों के भी होते हैं कान, कुछ सुन जाय, जरूर देती होगी ध्यान। पर मेरी तरफ की दीवार न सुन सकती है, मूक- बधिर है, न बोल सकती है। बारिश हुई, एक जगह से ईंट निकल गई, देखा मैंने मोखले में चिड़िया ही बस गई, तिनके, पत्तों के योग से घोंसला बना लिया, मेरी ओर से निश्चिन्त हो, उसने परिवार बसा लिया। दो ईंटों के बीच एक बीज सुगबुगाया, नमी मिली, मिली जान, वह अखुआया। लो दीवार के बीच एक पौधा भी उग आया, निराश न रहो- यह पौधा सीखा गया। मैं निहार रहा दीवार, बैठा घर के बाहर, प...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !