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Showing posts from October, 2016

आओ, इस बार नया कुछ कर लेते हैं

नहीं चाहती दीपों में एक दीप जलाऊं , चाह यही, गहन तिमिर में एक दीप जलाऊं | हर वर्ष हम रस्म - गुजारा कर लेते हैं | आओ , इस बार नया कुछ कर लेते हैं | शहीदों के परिवार में है नैराश्य का अंधकार , सूना है हर पर्व , हर पल उनमें है मायूसी के उद्गार | आओ , शहीदों की शहादत को स्मरण करें , एक दीप जला , संग पर्व मना ,नमन करें , नमन करें | माई की झुग्गी में है घनघोर अँधेरा , आओ, दीप जला , झुग्गी में कर दे उजेरा | रामू रोशनी बिना न हो सका शिक्षित , एक दीप जला , उसका जीवन कर दे प्रमुदित | सौहार्द और प्रेम की छटा सदा बनी रहे , एक दीया माटी का वृत्तिका संग हुंकार भरे | जात-पात का भेद , द्वेष - भाव का हो विसर्जन , सच मानो तो यही दिवाली है 

मेहनत- किस के लिए ?

                                                      प्रकाश की आलीशान कोठी - आधुनिक साज सज्जाओं से सुसज्जित - अपनी भव्यता का परिचय दे रही है | घर के बाहर लॉन में मखमली घास , गैरेज में खड़ी गाड़ियाँ सम्पदा के प्रतिक हैं | घर बड़ा है , पर घर में रहने वाले महज चार सदस्य - प्रकाश ,पत्नी श्यामा और दो बेटे | यह कोठी पुश्तैनी नहीं है , बल्कि प्रकाश ने अपनी कमाई से ही इस कोठी को ख़रीदा है | इससे पूर्व यह परिवार दो बेडरूम -रसोई के फ्लैट में रह रहा था | प्रकाश ने एक दुकान से अपना व्यवसाय प्रारंभ किया था | काम धंधा अच्छा चला | दुकान ने बड़ी कंपनी का और फ्लैट ने कोठी का रूप ले लिया | श्यामा एक साधारण गृहिणी है | पहले तो बच्चों के लालन पालन में व्यस्त रही | पर अब फुरसत होने पर भी , साधन और सुख-समृद्धि बढ़ने पर भी इसमें कोई ज्यादा अंतर नहीं आया | नौकर- चाकरों से काम लेना , महंगे कपडे पहन कर महंगे कालीन पर चलने की शालीनता - ये अदब जरुर स्वाभाव में आ गए | हाँ , प्रकाश की जी...

करवा चौथ का चाँद

भारतीय स्त्रियों के सुहाग का त्यौहार | साज - श्रृंगार  का यह त्यौहार | दिन ढले , अँधेरी रात में चाँद के इंतज़ार का यह त्यौहार | सुहाग पर्व पर जब चाँद आसमान में आता है , तो अपने इन्तजार में असंख्य नैनों को बेकरार पाता है | हर सुहागन के करवे से निकली जलधाराओं में मन्नतों का अटूट सिलसिला होता है , विश्वास होता है | इस रात चाँद दीवारें पार करके छत पर निकाल लाता है - रिश्तों को | सबको जोड़ना - जुड़ना सीखा जाता है - करवा चौथ का चाँद | युगल प्रेम बढ़ा जाता है - करवा चौथ का चाँद |

कागज़ के रावण

गत दशहरे पर - जब रावण को जलते देखा, तो मिट गई शंका की रेखा | अब कोई रावण नहीं बचा है , लो , फिर एक रावण तैयार खड़ा है | कागज़ की रावण हम जला रहे ,  पर जिन्दा रावण तो हैं घूम रहे | अन्याय , अधर्म , अहंकार , ये सब ही तो  हैं रावण के परिवार | पग - पग पर दम्भ भरते मेघनाद , जो सदा दे रहे रावण का साथ | मूँदे आँखे हम हैं मौन , कुम्भकरण हम नहीं तो कौन !

वरद हस्त रख दो माँ

                                                 हम भारतीयों की धार्मिक प्रवृत्ति बहुत सुयोजित है | हम मंदिर या देवालय जाते हैं | पादुकाओं को  दरवाजे पर छोड़ चौखट पर मस्तक टिकाकर देवता के सामने हाथ जोड़ कर बैठ जाते हैं | हम बिना कुछ कहे - निःशब्द रह कर प्रभु के सामने अपने मन का दामन फैला देते हैं | दोनों हथेलियों को एक दूसरे पर रख कर चरणामृत को लेते हैं , जमीन पर बूंद गिरने से बचाने के लिए सिर पर हाथ फेरते हैं | इन सब के बीच सभी को यह विश्वास तो है ही कि यहाँ बोलना जरुरी नहीं ! कुछ तो है जिस की मौजूदगी हमें यकीन दिलाती रहती है | मंदिर के द्वारा ही एक सच का शिद्दत से यकीन हो जाता है कि इस कायनात के सभी लोग ' सुख की चाह ' रूपी धागे से जुड़े हैं |                                                    हिन्दुस्तानी तहजीब में आस्था के अलग-अल...