नहीं चाहती दीपों में एक दीप जलाऊं , चाह यही, गहन तिमिर में एक दीप जलाऊं | हर वर्ष हम रस्म - गुजारा कर लेते हैं | आओ , इस बार नया कुछ कर लेते हैं | शहीदों के परिवार में है नैराश्य का अंधकार , सूना है हर पर्व , हर पल उनमें है मायूसी के उद्गार | आओ , शहीदों की शहादत को स्मरण करें , एक दीप जला , संग पर्व मना ,नमन करें , नमन करें | माई की झुग्गी में है घनघोर अँधेरा , आओ, दीप जला , झुग्गी में कर दे उजेरा | रामू रोशनी बिना न हो सका शिक्षित , एक दीप जला , उसका जीवन कर दे प्रमुदित | सौहार्द और प्रेम की छटा सदा बनी रहे , एक दीया माटी का वृत्तिका संग हुंकार भरे | जात-पात का भेद , द्वेष - भाव का हो विसर्जन , सच मानो तो यही दिवाली है
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !