खुशनुमा दौर चल रहा था, सफर का, सबक अधूरा ही था, अभी जिंदगी का। कैरोना ने डेरा डाल, सब कुछ हिला दिया, आपदा के दौर ने हमें जीना सिखा दिया। जीवन पथ चुनौती दे रहा, हर कगार पर, अंगारों का क्या भय, जब चलना हो इसी पथ पर। इस छुपने-छिपाने के खेल में कितने ही ढह गए, कुछ तूफान की आहट से ही बिन बरसात बह गए। पर्दा आंखों से हमने झूठी उम्मीदों का गिरा दिया, झूठी लालसाओं के बंधन से खुद को मुक्त करा लिया। हवा का रुख देख मैंने नाव के पाल को थाम लिया, घर में रहे सिमटे, पर रिश्तों को मजबूत बना लिया। जब दौर हो गर्दिश का, अस्तित्व है बचाना जरूरी, जिंदगी के इस मंजर में, धीरज रखना है जरूरी ! कैसा भी रहा हो दौर, कब कहाँ है यह ठहरा? यह समय भी नहीं रहेगा, मानो अब ही गुजरा।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !