आज सूना-सूना सा है यह शहर, भला क्यूं कर, वीरान है हर पहर। चहुँ ओर -छोर की यह निस्तब्धता, आभास कराती मन में पसरी व्याकुलता। मेरे आँगन के तरु हैं मुरझाए, मंडरा रहे गहरे धुंधले साए। जुनून कहूँ या पागलपन इस खामोशी को, सुनता नहीं कोई किसी की बातों को। अमरबेल सी लिपटी है मेरी इच्छाएँ, राह है मुश्किल, कौन मन को समझाए। गहन कुहासे से है पथ-अवरुद्ध, चुनौतियां हैं अनगिनत, मैं हूँ निःशब्द। नहीं रही संवेदना, मूंद गए नयन। मुँह में है राम, हाथ में है जाम। धर्म की आड़ में कत्ल हो रहा ईमान, स्तब्ध है सृष्टि, कब होगा विराम।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !