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Showing posts from September, 2016

बाबूजी ---गतांक से आगे

                                                                  अगले सप्ताह बाबूजी का फ़ोन आया- ' मैं रविवार को मुंबई पहुँच रहा हूँ | ' रविवार सुबह बाबूजी आ गए | घर में काफी रौनक हो गई | पूरा दिन बाबूजी अपना सामान अपने कमरे में व्यवस्थित करने में लगे रहे | मदद के लिए बार-बार सुनील को बुलाते | रात खाना खाते वक्त सीमा बोली- " बाबूजी , मैं सुबह दस बजे दफ्तर जाती हूँ और शाम पांच बजे लौट आती हूँ | " बाबूजी समझ गए , बोले- " बेटा , मैं सुबह चाय नाश्ता तुम लोगों के साथ करूँगा , मेरे लिए खाना बना कर रख जाना - मैं दोपहर में खा लूँगा | शाम की चाय तुम्हारे साथ पीऊंगा | "                                                                   सोमवार- घड़ी की वही भागती सुइयाँ और अ...

बाबूजी

                                               सीमा ने ऑफिस से आकर घर का ताला खोला , अन्दर एक लिफाफा पड़ा मिला | अरे , यह तो बाबूजी का पत्र है | ऊपर पते पर सीमा - सुनिल दोनों के ही नाम लिखे हैं | उनके हर पत्र पर दोनों का ही नाम लिखा होता है , जिससे पत्र व्यक्तिगत न लगे | पत्र खोला , लिखा था - ' मैं नौकरी से एक वर्ष पूर्व ही सेवानिवृत्ति ले रहा हूँ और तुम दोनों के साथ रहना चाहता हूँ | पहुँचने की तारीख तय होते ही सूचित करूँगा | '                                                  सीमा को बीते दिनों की याद हो आई | दो वर्ष पूर्व सीमा मुंबई के इस घर में ब्याह कर आई थी | तब माँ - बाबूजी यहीं साथ में रहते थे | पर छः महीने बाद बाबूजी का ट्रांसफर नागपुर हो गया | इन छः महीनों में सीमा ने गौर किया था कि बाबूजी को घर के किसी काम में मदद करने की आदत नहीं थी या...

कौन जाने , कब ये ठहरे !

बंधे हाथों पर टिकी है ठोढ़ी, मुग्ध हूँ , ख्यालों में थोड़ी-थोड़ी | मन अस्थिर है पर विचलित नहीं , खोने का कोई अवसाद नहीं| स्मृति की मंजूषा में मोती अनेक, अनमोल हैं , तराशे गए नेक | उपकार प्रभु का , मानव जीवन पाया , जीवन में है बहुत कुछ पाया | क्या कहूँ , शब्दों ने नहीं सीखा , मानो गूंगे के लिए गुड़ सरीखा उंगली पकड़ जिन्हें चलना सिखाया , आज मेरे बच्चों ने ही हौसला बढ़ाया | आज उम्र मेरी साठ हो गई , लो , मैं बड़ी ,बहुत बड़ी हो गई | सुर्ख काया कुछ मटैली हो गई , चनचनाती धूप कुछ मद्धिम हो गई पर उमगती है उमंगों की लहरें , कौन जाने , कब ये ठहरे !\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\ हर स्पंदन पर बढ़ती एक चाहत , कुछ देर बैठ , लूँ अब राहत | रिश्तों की उधड़ी बखिया सी लूँ , अपनी अधूरी इच्छाओं को फिर जी लूँ ! नहीं कभी कोई इच्छा महान बनूँ ,  बस फर्ज निभा एक इंसान बनूँ |

एक माँ की सीख

                                                                                             " बच्चे स्कूल से आ गए क्या ?"  कमरे में से सुशीला ने आवाज दी | सास की आवाज से रमा की तन्द्रा भंग हुई | रमा डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठी है | बोली- " हाँ , माँ जी , बच्चे आ गए हैं | कपड़े बदल रहे हैं | आप आइये | खाना परोस रही हूँ | " सुशीला प्रायः अपने बड़े बेटे के पास रहती हैं | इन दिनों रमा सुरेश के पास आई हुई हैं | सुशीला ने घर में एक नियम बना दिया है कि यहाँ उनके रहते घर में उपस्थित सभी सदस्य एक साथ बैठ कर ही खाना खाएं | बच्चे जया और जतिन कुर्सी पर बैठ गए | रमा ने खाना परोसा -दाल  और भरवां भिन्डी , रोटी | जतिन को दोनों ही चीजें पसंद नहीं | थाली परोसते ही बिदक गया और जोर से थाली को धक्का दे कर चिल्लाया - " मम्मी , मैंने आपसे कितनी बार कहा है मुझे ये स...

घर पधारो गजानंद

एक व्यक्ति गरीबी से त्रस्त था | किसी ने सुझाव दिया - ' गणेश जी की पूजा कर , प्रथम आराध्य देव हैं | तेरी सभी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी | ' वह अगले ही दिन गणेश जी की मूर्ति ले आया और घर में स्थापित कर ली | रोज स्त्रोतों  का पाठ करता | घंटे-घड़ियाल बजाता | पूजा -अर्चना में कोई कमी नहीं रखी | दो वर्ष  बीत गए , परन्तु आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया | एक दिन उसने गुस्से में गणेश जी की मूर्ति को हटा कर लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित कर दी | गणेश जी से तो नाराज था ही | अगरबत्ती का धुआं , घंटो की आवाज गणेश जी तक न पहुंचे इसलिए रुई की गोलियाँ गणेश जी कान - नाक में लगा दी | इस तरह उसकी नाराजगी साफ जाहिर हो रही थी |  थोड़ी ही देर में गणेश जी की मूर्ति हँसने लगी | अब तो वह घबरा गया | विस्मय दृष्टी से गणेश जी को देखने लगा | गणेश जी बोले -" जब तक तू हमें जड़ मानता रहा , तब तक हम भी जड़ भगवान् थे | पर आज तूने मुझ में चेतना की अभिव्यक्ति करा दी , तू मुझे तुझ से मिलने आना ही पड़ा | गणपति बाप्पा मोरिया |