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Showing posts from April, 2016

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...

ओम जय जगदीश हरे

ओम जय जगदीश हरे , ओम जय जगदीश हरे , प्रभु , तेरे द्वार रत्न भण्डार , तेरे घर बड़े हरे -भरे | पद्मनाभ हो या वैष्णो देवी या हो तिरुपति , शिरडी हो या सिद्धी विनायक गणपति | तहखानों में बरसती सम्पदा रिमझिम-रिमझिम , खुल जा सिम सिम , खुल जा सिम सिम | प्रभु जग ने जाना भारत है सोने की चिड़िया , जानो , बूझो कितनी चमकीली, विराट है चिड़िया ! इस सोने की चिड़िया से क्या होगा देश का भला ? क्या धन सम्पदा जरुरतमंदो को रहेगा फला ? प्रभु , तूने बहुत कुछ दिया , तेरा तुझको अर्पण , पर जब तुझसे न संभले , कर मुझ को ही अर्पण | जो प्रसाद चढ़ाते , मिल-जुट-बाँट खा लेते , कोई ऐसी राह बना , चढ़ावा न चढ़ जाये स्विस के खाते| प्रभु , हर रूप में है तू नारायण , हाथ जोड़ खड़े हम दरिद्र- नारायण | प्रभु , तू है पूर्ण , नहीं चाहिए तुझे कुछ , आशीष बनाए रखना , हम पा  जाए बहुत कुछ | ओम जय जगदीश हरे , ओम जय जगदीश हरे |

कँवर साब सासरे जार फँस गा

रिश्तों हाल पक्को ही हुयो थो | कच्चा रिश्ता में जवाई जी सासरे गया | खातिरदारी तो होणी ही थी | घरां कोई  मोट्यार कोनी थो  | | सासूजी खूब आवभगत की | खाने को टेम थो - आसन बिछा दी , पाटे पर थाली रखी और खानो परोस दियो | जवाई  जी खानो खाने बैठगा | थाली में सब्जी, कढी, दही-बड़ा , चूरमो घणी चीजां थी | सासूजी  कने ही बैठगी- पंखों झेला लागी | जवाई जी ने कढ़ी कोनी भाती | सोच्यो पहले एने ही ख़तम कर दा और पी गो | सासूजी भोत राजी हुई ,सोची - ' कँवर जी ने कढ़ी भोत स्वाद लागी ,इलिए कटोरी रीति कर दी |' बा ओजू कढ़ी परोस दी | कँवर जी घबरा गा - तुरंत कटोरी मुंडे से लगाईं  और रीति कर दी | सासूजी भोत  राजी , फेर कटोरी भर दी | जवाई जी परेशान - फेर कढ़ी पी ली | पंखो हिलाता - हिलाता सासूजी  बोली -'' कँवर जी थे कित्ता भाई हो ? '' कँवर जी चक्कर तो खा ही रया था , परेशान हो कर बोल्या - ''जी , इब तक तो चार हां, पर इब थे कढ़ी परोस दोगा तो तीन ही रह जावेगा  !''

गिरगिट

                                        आप सभी जानते हो -'गिरगिट '| गिरगिट  रंग बदलता है | प्रायः अपने विचार बदलने वालों को गिरगिट की श्रेणी में रख कर लोग व्यंग कसते हैं | पर ऐसा क्यों ? क्या विचारों को बदलना  बुद्धि की अस्थिरता और नासमझी है?| मैं तो ऐसा नहीं मानती !                                         हमारी जिन्दगी पानी के प्रवाह की तरह गतिमान है- इसे किस-किस परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इस पर कितने ही प्रभाव हावी हो जाते हैं | आज का लिया हुआ निर्णय शायद कल बदलना पड़े ! शायद सन्मुख खड़े तकाजे इन्हें मोड़ दे | गिरगिट को ही देख ले - वह अपने बचाव के लिए या भावों को व्यक्त करने के लिए रंग बदलता है |  जड़ बने रहना परिस्थिति के अनुकूल न ढलना - अपरिपक्वता होगी | समय के अनुसार अपनी चाल बदलें- सीधे चलते हो तो टेढ़े भी चल कर देखें -यही विद्वता की निशानी है |       ...

परछाई

राह में चलते , अपनी ही परछाई देख मैं मुस्कराई, एक नुक्कड़ से दुसरे नुक्कड़ तक, मेरा आकार वही , कद वही , पर मेरा प्रतिबिम्ब , बदलता , सरकता , नाचता | पढ़ा था , सुना था - कभी -कभी  अपने साये से भी लगता है डर | नहीं , मैं डरी नहीं , मैं खुश हूँ- एक स्थिर आकृति अस्थिर प्रतिबिम्ब को देख | सहसा मैं कांप उठी , मेरी ही छाया अदृश्य हो गई , मैं तो यहीं हूँ  , भला  ' वो ' कहाँ गई ? उसे खोजने नज़र दौड़ाई , पीछे मुड़कर देखा- एक विशाल आदमकद व्यक्ति की विशाल छाया में , मेरी ही परछाई खो गई, पल भर में मैं बौनी हो गई |