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Showing posts from 2024

धर्मभाई

                     कुछ ही महीने पहले मनीष का ट्रांसफर हुआ। मनीष और मिताली नई जगह , नए शहर में अनजान राहों और अनजान लोगों के बीच स्वयं को धीरे धीरे ढाल रहे थे। कोशिश जारी ही थी कि मनीष का एक्सीडेंट हो गया। अभी तो मिताली का पड़ोसियों से परिचय भी नहीं हुआ। मनीष को अस्पताल में भर्ती किया। इस शहर में कोई जान पहचान का ही नहीं। डॉक्टर ने कहा- " खून काफी बह गया है, अभी खतरा टला नहीं है।" मिताली के पास जो भी रकम थी खत्म हो गई। कल क्या होगा? मिताली सोच रही थी- 'माँ-पिताजी को फोन करूँ? पर वे क्या कर सकेंगे, उनकी चिंता और बढ़ जाएगी। भैया को फोन करूँ? ना, ना, भाभी को अतिरिक्त खर्चे पसन्द नहीं। हे प्रभु, मदद करो। कोई राह सुझाओ।' मिताली शून्य- सी घर की तरफ चली जा रही थी, तभी तीव्र गति से एक बाइक उसके पास से गुजरी। उस पर बैठे व्यक्ति का पर्स सड़क पर गिर गया। मिताली ने पर्स उठाया, बाइक के पीछे दौड़ी। उन सज्जन को पुकारकर रोकने की कोशिश की, पर असफल रही। घर पर आकर पर्स खोला, उसमें 40 हजार रुपए थे। रुपयों के साथ एक पहचान पत्र, मोबाइल नंबर और पता भी। मिताल...

इच्छा का सम्मान

          डॉक्टर सक्सेना आज फिर अपने बड़े बेटे पर झल्ला पड़े-"सुनील, तुम इस तरह समय बर्बाद करते रहोगे, तो नीट कैसे क्लियर कर पाओगे?" "पापा एक घंटे के लिए बैडमिंटन खेलने गया था। आपके कहे अनुसार कोचिंग भी जॉइन कर ली। आप जानते हो, मैं मेडिकल में नहीं जाना चाहता हूँ। मैं स्पोर्ट्स में अपना कैरियर बनाना चाहता हूँ।" "क्या, मेडिकल में जाना नहीं चाहता? अरे, मेरा यह हॉस्पिटल कौन संभालेगा? तुम्हारा छोटा  भाई बीमार रहता है, उससे MBBS की उम्मीद नहीं कर सकता। तुम्हें हर हाल में नीट क्लियर करना होगा।" 'हमेशा दूसरों के हिसाब से जिंदगी जिओ।'-यह बड़बड़ाता हुआ सुनील अपने रूम में चला गया।           डॉ. सूर्यकांत सक्सेना का बड़ा मल्टीस्पेशलिस्ट नर्सिंग होम है। कड़ी मेहनत से यह अस्पताल खड़ा किया है। छोटे शहर में इनका अलग रुतबा है। अस्पताल में कई स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स भी बैठते हैं, जिस से एक ही जगह कई बीमारियों का इलाज हो जाता है। सुनील के व्यवहार से डॉ. सक्सेना परेशान हो गए। रात पत्नी से बोले- इसे पढ़ाई के लिए दूसरे शहर भेजना पड़ेगा। यहां के यार-दोस्तों से दूर रहे...

पहचान

          पंद्रह दिन पूर्व स्निग्धा को हॉस्टल वार्डन की जिम्मेदारी मिली। एक साधारण गांव में यह स्कूल है। प्रायः साधारण, निर्धन परिवार के बच्चे ही यहाँ रहते हैं। स्निग्धा को दो रूम का क्वार्टर मिल गया। दरवाजे पर नेमप्लेट लग गई- 'स्निग्धा शर्मा, छात्रावास अधीक्षिका'। भैया जैसा रुतबा तो नहीं, पर पहचान तो मिली। घर से निकली, जब भैया भाभी नाराज थे। भाभी ने कहा था- "तुम सही गलत रास्ते समझती हो। पर घर से दूर अनजान जगह पर रहना आसान नहीं है। जब भी लगे, घर लौट आना। माँ को तुम्हारी कमी खलेगी।" भैया बोले थे- "तुम माँ की स्थिति देख रही हो! अब इनके निजी कामों में भी सहारा देना पड़ता है। तुम्हें माँ के प्रति अपने दायित्वों का अहसास होना चाहिए। तेरी भाभी पर सारा बोझ आ जाएगा। यहाँ मिल बाँट कर सारे काम हो जाते हैं, वहाँ तुम अकेले कैसे मैनेज करोगी?"           स्निग्धा चालीस वर्ष की हो गई है, पर भैया आज भी उसे दायित्वों का बोध करा रहे हैं, जब कि वे भूल गए- उसके प्रति भी उनका दायित्व है। जिससे स्निग्धा ने प्यार किया, उसे भैया ने दुत्कार दिया क्योंकि उसकी जाति ...