आज राह चलते-चलते बदलते हैं मंजर, कैसा आ गया है एक तूफानी बदलाव ! थम गए हैं मेरे कदम, लिए प्रश्न कई भीतर, क्यों न मैं बदल सकी, रह गई अकेली। समय के पृष्ठ पर लिखी इबारतें, त्वरित गति से हो रहीं अदृश्य। है चुनौती, इन इबारतों को हम पढ़ लें, क्योंकि परिवर्तन का डस्टर है बड़ा गतिमान। अतीत में जीना, जैसे पुराना नोट भुनाना, लाख कर लें कोशिश, चल नहीं सकता। बड़े कहें-भविष्य की कल्पना में मत फँसो, जीवन तो नगद है, उधार नहीं। 'यूज़ एन्ड थ्रो' की अवधारणा, भागमभाग और इंस्टेंट पाने की चाहत, अंगूठे दे रहे 'लाइक्स' और 'थम्स अप', और प्रतिक्रियाएं बदल रहीं हैं भावना। दुर्घटनाओं के बन मूक दर्शक वीडियो बना, कर रहे वायरल। अभिव्यक्त का तरीका हुआ अनूठा, व्यवहार और अहसासों के मूल्य गए बिखर। सिसकती मानवता, सोता समाज, शिकायत करें तो किससे और कैसे ? तकनीक और तरक्की की दौड़ में, इंसानियत का अर्थ ही न बदल जाए !
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !