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Showing posts from 2021

गृहिणी- हाउस मेकर

          मैं दिशा शर्मा- कलम और कागज ले कर बैठी हूँ। लिखने से पहले बैचेनी, कभी उदासी और खामोशी की कैफियत बन रही है। जज्बात और ख्यालात का सैलाब उत्तेजित हो रहा है। लिख रही हूँ- हर गृहिणी के मर्म के बारे में। मैं भी एक गृहिणी हूँ- एक साधारण परिवार की। किसी की अच्छी होती है, किसी की बुरी होती है- कहानी तो सभी की होती है।           'गृहिणी' 'हाउस वाइफ', इसे बोलने में लोगों की जुबान पर बहुत ठंडापन क्यों रहता है? क्या हाउस वाइफ वर्किंग नहीं होती! बल्कि मल्टी टास्किंग वर्क और फुल टाइम जॉब। काम के कोई घण्टे तय नहीं, हफ्ते में कोई छुट्टी नहीं, कोई वेतन नहीं। हाउस वाइफ शब्द क्यों? हाउस- मेकर कहा जाना चाहिए। पिछले महीने मुझे डेंगू हो गया था, घर के सभी कामों में व्यवधान आ गया। उस दिन एहसास हो गया- गृहिणी किस तरह गृहण कर लेती है- सारी व्यवस्था, जिम्मेदारी, एक अकेली।           दो दिन से मन बड़ा अशांत है। ज्यों ज्यों बच्चे बड़े हो रहे हैं- चिल्लपों बढ़ती जा रही है। जबकि अपनी इच्छाएँ, जरूरतें, सपने। सारी जिंदगी बच्चों का ख्याल रखा...

स्वाभिमान

          आज सुबह से सुप्रिया को मोबाइल पर बधाइयां मिल रही हैं। कल अंतर्राज्यीय स्कूलों के बीच सेमिनार था। विषय था -' वर्तमान परिस्थिति में छात्रों का शैक्षिक विकास के साथ सामाजिक विकास कितना जरूरी है?' सुप्रिया गर्ल्स स्कूल की उप-प्रधानाध्यापिका है। सेमिनार में सुप्रिया के विचारों और सटीक तथ्यों से सभी प्रभावित हुए। सुप्रिया ने मोबाइल रखा तो देखा, पीछे सुशील उन्हें टेढ़ी निगाहों से देख रहे हैं। "बड़ी बधाइयां मिल रही हैं , तुमसे तो हर कोई खुश हो जाता है।" "मुझ से नहीं , मेरे काम से , विचारों से।" कहती हुई सुप्रिया रसोई की तरफ मुड़ गई।           खाने में, नाश्ते में क्या बनना है- यह सासूजी ही तय करती हैं। यदि मूड ठीक हो तो सब्जी काट कर, दाल भिगो कर रख देती हैं, वरना सुप्रिया को तो करना ही है। हाँ, मेनू तय करने की छूट उसे कभी नहीं मिली, उसने चाही भी नहीं। अच्छा ही है सबकी पसंद नापसन्द के टेंशन से फ्री। आज सासूजी थोड़ी उखड़ी हुई हैं क्योंकि उनका बेटा उखड़ा हुआ है। उनकी तीखी आवाज ने सुप्रिया के कान खड़े कर दिए- "कितनी ही बधाइयां मिल जाय, कहलाएगी तो...

चाय की टपरी

पेड़ के तले वो दीनू की गुमटी, टीन की छप्पर, वो चाय की टपरी। भक भक करता सुलगता स्टोव, तिस पर चढ़ी हत्थे वाली भगौनी। अदरक की खुशबू उड़ाती चाय,  कदमों को खींच लाती चाय। ईंटों के स्तूप, पुरानी टूटी कुर्सियाँ, आड़े तिरछे पत्थर, उल्टे लगे पीपे। जिस पर बैठ अखबार बाचना, महफ़िल, अखबार और चाय का संगम।  दुनिया के हाल पर होता है विवेचन, कहीं फेंका गया तेजाब, कहीं लुटा हिजाब। फसल हुई तबाह, कर्ज नीचे दबा कृषक, यहां सभी चिंताए मुखर होती निर्बाध। सुलगते, दहकते देशभक्त जज्बात, विद्रोह बन आ जाते लबों पर। सत्ता के कार्य कलापों पर, हो जाया करती बहस। चंद क्षणों में सिमट जाता ,यह विस्तृत संसार। फैशन हो या फ़िल्म, चर्चाएं हैं बदलते जमाने की। कुल्लड़ थामे हम पढ़ जाते पूरा अख़बार। कटिंग चाय की चुस्की के साथ, दोस्तियाँ थामे रहती हैं हाथ। पास से जाती देख नवयौवना, मुस्कान के साथ दोस्तों का फुसफुसाना। बोझिलता में लाती नई उमंग, चाय का स्वाद बढ़ाती यह तरंग। जाते-जाते, "चल यारा, कल मिलते है, इसी समय, इसी चाय की टपरी पर।"

वो दिन

निष्ठा घर के पास मेन रोड पर आ गई। सुबह से रात तक ट्रैफिक की चिल्लपों और उस से उठने वाले गर्द के गुबार और जेठ की तपती दोपहर से हाल बेहाल दिखने वाला यह...शहर। यहां कई दुकानें हैं। वो दिन थे, यहां बहुत भीड़ हुआ करती थी। तीन वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। दुकानों पर गिने चुने ग्राहक और उबासी लेते दुकानदार। आभासी संसार के माध्यम से खरीदारी का तरीका ही बदल गया है। इसे एक मार्केट स्ट्रेटजी कहें या फिर नया ट्रेंड। बिना घर से निकले--- चुटकियों में खरीदारी हो रही है अर्थात ऑनलाइन शॉपिंग, पर इस से इन दुकानदारों के गल्ले खाली हैं। निष्ठा के कदम एक परचून की दुकान के आगे थम गए। इसकी दुकानदार एक वृद्धा है। निष्ठा ने आगे बढ़कर नमस्ते किया और सामानों की लिस्ट थमा दी, जिसमें तेल, साबुन, दालें,मसाले सभी कुछ लिखे थे। सारा सामान ले कर निष्ठा घर पहुंची। हाथ में सामान देख कर माँ आश्चर्य चकित रह गई।  "अरी, मैंने तो तुझे ऑनलाइन ऑर्डर करने को कहा था।" " हाँ, माँ, पर सामने रखी चीजों की खरीदारी करने में चीज बढ़िया मिलती है। इनके स्पर्श का अहसास भी होता है। ऑनलाइन शॉपिंग में यह अहसास कहाँ ? बस, चित्र ...

भात

            ज्यों ज्यों बिटिया की शादी की तारीख नजदीक आ रही है, नंदिनी की नींद उड़ती जा रही है। कुछ महीने पहले ही जेठ जी बेटी की शादी हुई थी। तभी नंदिनी ने सारे रस्मों रिवाजों को आंखों में उतार लिया था। विवाह के सारे रिवाजों को उसने एक पेपर पर क्रम से लिख लिया है, उन रिवाजों से संबंधित सामानों की लिस्ट बना ली है। तैयारी पूरी कर ली है। बस, भात की प्रथा को निभवाने में उसे संकोच हो रहा है।             भात की प्रथा काफी अर्से पहले प्रारंभ हुई थी क्योंकि पहले लड़की को समुचित शिक्षा नहीं मिलती थी और उसे अपने पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता था। इस प्रथा के बहाने लड़की को अपने बच्चे के विवाह में अपने मायके से थोड़ी मदद हो जाती थी। पिता और भाई आगे बढ़कर इस रिवाज को बखूबी निभाते थे। जेठ जी की बेटी की शादी में जेठानी जी के चारों भाई भात ले कर आए थे। कपड़े, रुपये, सोना, चांदी क्या नहीं दिया उन्होंने ! कुछ तो फिजूलखर्ची और दिखावा सामाजिक प्रतिष्ठा के पैमाने बन गए हैं।             नंदिनी के पिता काफी वर्ष पू...

ख्वाहिश

ख्वाहिश ही तो है, रह रह कर      उठना है इसकी फितरत। जिंदगी के हर पड़ाव पर अरमान       हैं कि जमे रहे अन्तरत। मुद्दत से इन आँखों में      तरवरिश नहीं झलकी। ख्वाहिश की कोई इन्तिहा नहीं      क्यूं कर अब छलकी। जाने कल जिंदगी के फैसले का      होगा क्या इम्कान। ख्वाहिश- शेष लम्हे हंस कर बिता लें      न हो कोई हलकान। इस काबिल नहीं, कलम बन      किसी की खुशियां लिख दूँ। हाँ, ख्वाहिश यही, रबड़ बन      किसी के गम मिटा दूँ। वर्षों से जज्बात, एहसास अब      क्यों तो जाग गए ? अरमानों को सदा दिल में दबा      'काश' ही बढ़ गए। स्नेह, उमंगों का हो संचय,       सदा करूँ ऐसा काम। हर परिजन की यादों में      लिखा रहे मेरा नाम। प्रभु, ख्वाहिश यही अगला जन्म      पंछी बन कर पाऊं। मंदिर हो या मस्जिद, स्वच्छंद हो      मुंडेर पर बैठ जाऊं। जात-धर्म का न कोई डर,      'खुले पंख' पा मैं इतराऊँ। मज...

सुबह का भूला

मैं मम्मी पापा के पास इंदौर आया हूँ। 10 दिन पूर्व ही पापा को रिटायरमेंट मिला है। सोहम की पढ़ाई के कारण शिवानी और सोहम नहीं आ सके। मैं कुछ दिन इंदौर रहूंगा। कई महीनों से पापा को अपने रिटायरमेंट का इन्तजार था। जब-तब फोन पर कहा करते- 'बहुत कर ली भाग दौड़, अब आराम करूंगा।' मानो कोई जश्न की तैयारी हो।            मुझे दो दिन में ही घर में काफी परिवर्तन लगा। पापा की दिनचर्या ही बदल गई। देर रात में सोना, देर से उठना। टी. वी. अखबार, किताबों में दिन बीतता, एक दो चाय-कॉफ़ी की एक्स्ट्रा डिमांड। मम्मी की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं। यहां दादी-दादाजी साथ में रहते हैं। मम्मी ने सुबह उठकर तीनों के लिए चाय बना ली, तीनो ने साथ में पी ली, फिर लग गई अपनी ड्यूटी पर। पापा उठे, तब उनके लिए अलग से चाय बनी। पहले, चारों साथ में बैठकर चाय पीते, अखबार, घर-परिवार, रिश्तेदारों की चर्चा होती। सुबह की चाय चारों के चेहरे पर मुस्कान और आत्मीयता ला देती।              पहले घड़ी की सुई से काम बंधे थे, अब ऐसा नहीं। पापा के टिफिन का खाना बना, तभी सब का, बस---। अ...

दृष्टिकोण

            मुझे नागपुर में रहते हुए 20 वर्ष हो गए हैं, तब बच्चे छोटे थे। अब सब की पढ़ाई हो गई, शादी हो गई। यह घर और घर के आसपास के लोग, यह सोसाइटी मुझे बड़ी प्यारी लगती है। इसने हमें बहुत कुछ दिया- मीठी यादें, कड़वे अनुभव, संघर्ष पूर्ण जीवन और अधिक मुसीबतों को झेलने का  हौसला..। मेरी हम उम्र बहनों से तो मानो लगाव हो गया है। स्मिता बहन, नीलिमा भाभी, संगीता भाभी, जया भाभी, देनिका भाभी- ये सब अपने परिवार की सी लगने लगी हैं। हम सब अपनी समस्याओं को आपस में ही चर्चा कर सुलझाने का प्रयास करती हैं।             काफी दिन हो गए थे, हम सब साथ बैठ कर गप नहीं मार पाए थे। तय हुआ-- शाम चार बजे सभी मेरे घर आ जाएंगी। साथ में चाय पिएंगे। सभी समय पर आ गई, मानो चार बजने का ही इन्तजार कर रही हों ! कोई टिफिन में पकौड़ी, चटनी ले आई, कोई मठरी, तो कोई ढोकला। लो जी, घर में चाट की टेबल सज गई। खा पी लेने के बाद देनिका भाभी ने अपने पर्स में से एक डब्बा निकाला। मेरी बहू को बुला कर बोली- "तुम्हारे अंकल मेरे लिए स्मार्ट फोन लाए है, तुम मुझे इसे चलाना सीखा दो...

शुचि

            मैं 'राशि' एक दत्तक पुत्री। मैंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मेरे जैविक माता पिता कौन हैं, क्योंकि मैं अपने जीवन से बहुत खुश थी। किसी तरह का मलाल अपने मन में नहीं लाना चाहती थी। जरूर उन्हें मेरी जरूरत नहीं थी और इन्हें मेरी बहुत जरूरत थी। कहते हैं- पालने वाला जन्म देने वालों से बड़ा होता है। उनके द्वारा मैं तिरस्कृत हुई, पर यहां सिर आंखों पर बिठाई गई। माँ ने तो मेरे लिए नौकरी ही छोड़ दी। मेरे माता पिता ने मुझे भरपूर प्यार, संरक्षण, संस्कार और अच्छी शिक्षा दी। उच्चतम शिक्षा के लिए मैं विदेश गई, वहीं कुछ महीने नौकरी भी की। इस बीच रोहन से मुलाकात हुई। हम दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। रोहन को विश्वास था कि उसके माता पिता उसकी पसंद पर कोई एतराज नहीं करेंगे। पर यह बात मैं दावे के साथ नही कह सकती थी। मैंने रोहन को बता दिया था कि मेरे माता पिता के निर्णय पर ही रिश्ता कायम रख सकूंगी। हम दोनों भारत आए। दोनों के माता पिता को रिश्ता पसन्द आया। एक वर्ष के भीतर हमारी शादी हो गई। मेरी नौकरी जारी ही थी।             पीहर औ...

शब्द

जेहन में घूम रहे भावों के चक्रव्यूह,  शब्द ढूंढती हूँ-अभिव्यक्त करने को। जज्बातों को कागज पर उतार, बुहार लेना चाहती हूं, मन का आँगन। अहसासों की गठरी दिल से लगा, अल्फाजों में सारे जज्बात उकेर दूँ। भीतर मचल रहे उम्मीद, ख्वाब, अरमान, यथेष्ट लफ्जों में बांध पा जाऊं निजात। मेरे ही शब्द मुझे जगह दिलाते, अतिरेक हो कभी हँसाते, कभी रुलाते। शब्दों के उबाल से उठता विवादों का धुआं, शब्दों की ध्वनि से रिश्ते बनते। अंतर्मन में जज्बात निःशब्द हों, तो मौन भी एक भाषा है। मेरी कलम मिथ्यालाप नहीं करती,  शब्दों से अक्स तो अपना ही दिखता है। ए दिल, ए मुख, जरा संभल,  निकले शब्द न लौटेंगे फिर। संभल संभल कर निकल, चुभते शब्दों को तू कर ले हजम।

रोजा

            कुछ वर्षों पहले की बात है। वाकया भूल नहीं पाती हूँ-जीवन के फर्ज और मूल्यों को सीखने का सबक मिला। मैं किसी काम से सिकन्दराबाद गई थी। वहीं मेरी सहेली रशीदा रहती है। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार उसके यहां मैं दो दिन रुक गई। रमजान का महीना था। मुझे पता था रोजे चल रहे हैं। मुझे उत्सुकता थी- इनके रीति-रिवाजों को जानने की। रशीदा के परिवार में उसका पति, बेटी शानू और अम्मी (सास)। पड़ोस में ही रशीदा के देवर साजिद का परिवार रहता है। रशीदा ने बताया- 'अम्मी हमेशा अल्लाह की इबादत में लगी रहती हैं, पर आधुनिक और खुले विचारों की महिला हैं।'  इनकी दी हुई शिक्षा दोनों परिवारों के संस्कारों में मुझे दिख रही थी। अम्मी मेरा बहुत ध्यान रखती। उन्होंने मेरे खाने-पीने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। शाम एलान हो गया था-कल शानू और रोशन ( साजिद का बेटा) रोजा रखेंगे। दोनों बच्चे 9-10 वर्ष के रहे होंगे, पहली बार रोजा रखेंगे। दोनों बहुत खुश थे। उन्हें अहसास हो रहा था, मानो रोजा रख कर वे बड़ों की श्रेणी में गिने जाएंगे। दोनों को बता दिया-सुबह चार बजे सेहरी दी जाएगी। कौतूहलव...

कर्त्तव्य की वेदी

            रागिनी सुबह से काम में जुटी है। काम है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेते! हर पल निगाह घड़ी पर जाती है। साढ़े नौ बजे घर से निकलना है। आज दोनों का नौकरी करना जरूरी हो गया है, वरना खर्चे कैसे पूरे हों? बच्चों की पढ़ाई के लिए शहर में आ गए। गाँव में मां- बाबूजी। भला एक की कमाई से जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे हो?  कभी कभी रागिनी के मन में विचार आता है कि सुचिता कितनी खुशनसीब है, कुँवारी है, हमेशा अपनी कमाई खर्च करने में पूरी स्वतंत्र है। हम तो अपने परिवार के खर्चों में अपनी इच्छाएं ही दबा लेते हैं।             रागिनी समय पर ऑफिस पहुंच गई। अरे, यह क्या? आज भी सुचिता नहीं आई। तीन दिन से सुचिता ऑफिस नहीं आ रही है। रागनी ने सुचिता को फोन किया, जवाब मिला- 'कुछ जरूरी काम है, दो दिन और नहीं आ सकूंगी।' सुचिता सदा चुटकुले छोड़ने वाली, स्मार्ट और मेहनती लड़की। फोन रखने के बाद रागिनी का मन विचलित हो गया। तीन दिन से ऑफिस में नीरसता छाई हुई है , अभी दो दिन और! रागिनी ने जरूरी काम खत्म किए और ऑफिस से सुचिता के घर का पता ले कर जल्दी ही ...