मैं दिशा शर्मा- कलम और कागज ले कर बैठी हूँ। लिखने से पहले बैचेनी, कभी उदासी और खामोशी की कैफियत बन रही है। जज्बात और ख्यालात का सैलाब उत्तेजित हो रहा है। लिख रही हूँ- हर गृहिणी के मर्म के बारे में। मैं भी एक गृहिणी हूँ- एक साधारण परिवार की। किसी की अच्छी होती है, किसी की बुरी होती है- कहानी तो सभी की होती है। 'गृहिणी' 'हाउस वाइफ', इसे बोलने में लोगों की जुबान पर बहुत ठंडापन क्यों रहता है? क्या हाउस वाइफ वर्किंग नहीं होती! बल्कि मल्टी टास्किंग वर्क और फुल टाइम जॉब। काम के कोई घण्टे तय नहीं, हफ्ते में कोई छुट्टी नहीं, कोई वेतन नहीं। हाउस वाइफ शब्द क्यों? हाउस- मेकर कहा जाना चाहिए। पिछले महीने मुझे डेंगू हो गया था, घर के सभी कामों में व्यवधान आ गया। उस दिन एहसास हो गया- गृहिणी किस तरह गृहण कर लेती है- सारी व्यवस्था, जिम्मेदारी, एक अकेली। दो दिन से मन बड़ा अशांत है। ज्यों ज्यों बच्चे बड़े हो रहे हैं- चिल्लपों बढ़ती जा रही है। जबकि अपनी इच्छाएँ, जरूरतें, सपने। सारी जिंदगी बच्चों का ख्याल रखा...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !