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Showing posts from May, 2024

पहचान

          पंद्रह दिन पूर्व स्निग्धा को हॉस्टल वार्डन की जिम्मेदारी मिली। एक साधारण गांव में यह स्कूल है। प्रायः साधारण, निर्धन परिवार के बच्चे ही यहाँ रहते हैं। स्निग्धा को दो रूम का क्वार्टर मिल गया। दरवाजे पर नेमप्लेट लग गई- 'स्निग्धा शर्मा, छात्रावास अधीक्षिका'। भैया जैसा रुतबा तो नहीं, पर पहचान तो मिली। घर से निकली, जब भैया भाभी नाराज थे। भाभी ने कहा था- "तुम सही गलत रास्ते समझती हो। पर घर से दूर अनजान जगह पर रहना आसान नहीं है। जब भी लगे, घर लौट आना। माँ को तुम्हारी कमी खलेगी।" भैया बोले थे- "तुम माँ की स्थिति देख रही हो! अब इनके निजी कामों में भी सहारा देना पड़ता है। तुम्हें माँ के प्रति अपने दायित्वों का अहसास होना चाहिए। तेरी भाभी पर सारा बोझ आ जाएगा। यहाँ मिल बाँट कर सारे काम हो जाते हैं, वहाँ तुम अकेले कैसे मैनेज करोगी?"           स्निग्धा चालीस वर्ष की हो गई है, पर भैया आज भी उसे दायित्वों का बोध करा रहे हैं, जब कि वे भूल गए- उसके प्रति भी उनका दायित्व है। जिससे स्निग्धा ने प्यार किया, उसे भैया ने दुत्कार दिया क्योंकि उसकी जाति ...