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Showing posts from November, 2016

परवरिश

                                                  हरिप्रसाद बहुत खुश हैं | बिटिया आरती की सगाई रामस्वरूप के बेटे राजीव के साथ हो गई | उनके दोस्त रामस्वरुप ने अपना वचन निभाया | कुछ ही वर्ष पूर्व ही रामस्वरूप ने कह दिया था  ' आरती को तो मेरे घर ही ले जाऊँगा |'                                                   आरती 5 वर्ष की थी , जब पत्नी का देहांत हो गया | आस पास ऐसा कोई रिश्तेदार नहीं था , जिस पर विश्वास करके हरिप्रसाद आरती को उन्हें सौंप पाते , लिहाजा परवरिश की पूरी जिम्मेदारी अपने ही हाथों में रखी | वे ही माँ थे और वे ही पिता भी | उनका हर दिन बिटिया को चुम्बन दे कर उठाने से शुरू होता और रात उसे थपथपाकर सुलाने से बीतता | सच मानो तो वे आरती के लिए ही जी रहे थे | घर के अन्दर आरती और घर के बाहर नौकरी - दोनों के बीच सामंजस्य बिठाए रखते थ...

डब्बा गोल

                                                   कल अखबार के मुखपृष्ठ पर लिखा था- सीनियर सिटीजन किसी भी बैंक में जा कर अपने पुराने नोटों के एवज में नए नोट ले सकते हैं - पढ़ कर प्रसन्नता हुई | हम दोनों 1000 के 4 नोट लेकर बैंक पहुंचे - क्योंकि नोट बदलवाने की सीमा मात्र 2000 प्रति व्यक्ति ही थी | बैंक में पहुँच कर पता चला - ' डब्बा गोल 'अर्थात् बैंक में कैश ही नहीं है | काम पूरा न होने का अफसोस रहा और हम बैंक से बाहर आ गए | हम सड़क पार कर ही रहे थे - तो एक युवक ने हमें रोका - " आपको नोट बदलवाने हैं क्या ? " हमने गर्दन हिला कर स्वीकृति दी , तो युवक ने अपनी जेब से 100 रुपये के कुछ नोट निकाल कर कहा - " ये 8 नोट हैं , आप इस के बदले मुझे 1000 रुपये का पुराना नोट दे दो | " हम मूक बने , उसे अनदेखा कर आगे बढ़ गए |                                             ...

मैं समय हूँ

मैं समय हूँ , सृष्टि के बराबर उम्र मेरी , सदा रही, सदा रहेगी , हुकूमत मेरी | पल , दिन , साल मेरा बोध कराती , भागता हूँ , पर पदों की आवाज नहीं आती | मुट्ठी में रेत को न रोक सकोगे , भला मुझे कैसे टोक सकोगे | मेरी निरंतरता , शाश्वतता को पहचानो , मेरे निष्पक्ष व्यवहार को जानो | गुजरा वक्त याद ही बन जाता है , आता वक्त एक ख्वाब ही होता है | वर्तमान ही बस मैं ' समय ' हूँ , ' आज ' ही मैं ' कालजयी ' हूँ | हर युग के इतिहास का साक्षी हूँ , सोने - चाँदी के सिक्कों का गवाह हूँ | पाइ , आना ,चवन्नी , को जाते देखा , तो २००० के नोटों को आते भी देखा | मैंने पनघट में पानी की गगरी भरते देखा , नल से भी पानी को टपकते देखा | अब बोतल में पानी को बिकते देख रहा हूँ , इस अमृत का निरादर देख उदास हूँ | जब गलती इन्सान कर जाता है , वह इल्जाम मुझे दे जाता है | कटघरे में खुद को खड़ा पाता हूँ , और वह बरी हो जाता है | पीड़ा के झंझावत में मुझे न फंसाओ , समय के साथ खुद ही बदल जाओ | तकाजा है वक्त का तूफां से जूझो , कहाँ तक चलोगे किनारे -किनारे ....बूझो |

पूत कपूत से तो बाँझ भली !

                                          कुछ दिन पूर्व एक वृद्धाश्रम के सामने से गुजरना हुआ | द्वार के पास काफी भीड़ दिखी - अनायास पैर अन्दर की और खींचे चले गए | इस से पूर्व आश्रम में दो बार चुकी हूँ | पर हमेशा तरह की नीरवता और शांति ही मिली | आज भीड़ को देख कर उत्सुकता हुई | पूछने पर पता चला - ' कौशल्या जी का देहांत हो गया | ' काफी वर्ष पूर्व कौशल्या जी के बेटे उन्हें इस आश्रम में छोड़ गए थे | इनके दो बेटे और एक बेटी हैं |                                            मैंने एक परिचित स्थानीय कर्मचारी से पूछा - " इनके बच्चे कब आएंगे ? " उन्होंने कहा - " जी कहाँ ? उनका कोई अता पता ही नहीं | जब तक पिता की पेंशन बच्चों को मिलती थी , तब तक हर माह कोई ना कोई बच्चा आता था , पर जब से हमने पेंशन कौशल्या जी को दिलानी आरम्भ की , तब से उनमें से कोई आया ही नहीं | उन्होंने जो पता लिखाया - व...