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Showing posts from July, 2017

एक भरोसा

                                          बुआ से लगाव मुझे सदा रहा | या यूँ कहो - बुआ के लिए मैं भी प्रिय भतीजा रहा | जिंदगी में उन रिश्तों की उम्र लम्बी नहीं होती , जो एकतरफा होते  हैं | बुआ की आत्मिक वात्सल्यता और मेरे दिल में उनके प्रति सम्मान में कभी कमी नहीं आई | बस , मेरे दिल में एक टीस से आत्मग्लानि बनी हुई है | पता नहीं - उनसे एक झूठ बोलकर मैंने सही किया या गलत !                                           पिछले वर्ष उनकी तबियत काफी नरम हो गई थी , उन्हें अस्पताल में भर्ती करा गया | उनके शरीर को अतिरिक्त खून की सख्त जरुरत थी | घर के सभी स्वस्थ सदस्यों के खून की जाँच हुई, पर किसी से उनका खून मेल नहीं खाया | उस समय मैंने भी अपने खून की जाँच कराई | अन्ततः बुआ को किसी अनजान ब्लड - डोनर के द्वारा ही खून दिया गया | खून तो शरीर में बहता है , वह व्यक्ति कौन है ? किस जाति का है...

आधार का आभार

                                            रामदीन एक खेतिहर मजदूर- दूसरों के खेत में मजदूरी करना ही इसका कमाई का साधन रहा | परिवार में बूढी मां , पत्नी और तीन बच्चे हैं | इस वर्ष तो अकाल से खेत तो सूखे ही , घर में भी खाने के लाले पड़ गए , तिस पर बीमार मां | चार दिन से चूल्हा नहीं जला , आज तो अनाज की व्यवस्था करनी होगी | यह पीतल का मटका किस काम का ? पत्नी को बता कर वह मटका बाजार ले गया और उसे बेचने पर  २०० रुपये उसके हाथ में आये | तभी उसने देखा - एक जीप पर सवार एक व्यक्ति माइक से घोषणा कर रहा था - ' सरकार इस गाँव में पक्की सड़क बनाना चाहती है , जिसके लिए मजदूरों की जरुरत होगी , जो भी काम करना चाहता हो , अपना नाम यहाँ की पंचायत में लिखा दे | ' रामदीन ने सोचा - ' इस काम में देर क्यों करूँ ' तुरंत पंचायत में पहुंच कर मजदूरों में अपना नाम लिखा दिया | अगले दिन से अपनी हाजिरी लिखाकर अन्य मजदूरों के साथ सड़क खुदाई में जुट गया |               ...

दो पल ....फुरसत के

कुछ बीते लम्हें यादों में ठहरे हैं , उनीदीं आँखों में ख्वाब सुनहरे हैं | समय के साथ भागमभाग कर रहे हम , चल न सके कभी फुरसत के चार कदम |                           आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || कुछ मुरीदों के ढेर , कुछ मुनिदों के धागे , जुड़ता रहा नया सफा जिन्दगी के आगे | पलटते रहे कलेंडर के पन्ने ,गुजरते रहे दिन , साल | अपना चेहरा देख आईना भी पूछ रहा सवाल |                           आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || उबरना चाहती हूँ अनचाही लम्हों की चुभन से , जागना नहीं चाहती , उस तिलस्मी ख्वाबों से | सुबह आने से पहले रात गुजर जायेगी , नजारों की ये हंसीं मुलाक़ात गुजर जाएगी |                          आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || रोज उसी मंजिल जाना है और आना है , फिर इन क़दमों में इतनी हड़बड़ी क्यों है ? जिंदगी के हसीन यादों के दरख्त बढ़ने दें , चुभती यादों की खरपतवार उखाड़ दें | ...

मॉर्निंग वाक

                                                    उम्र की झलक चेहरे पर , तन पर दिखने लगी , शिथिलता और थकान महसूस होने लगी , तो स्वास्थ्य के प्रति जागृत होने की भावना भी जाग उठी | लो जी , हमने प्रातः-सैर शुरु कर दी | हाँ , सही फरमाया - ' मोर्निंग वाक '| घर पास ही बहुत बड़ा पार्क है | प्रातःकाल-सैर के लिए उचित जगह है | सूरज की बाट जोहती पहली किरण से भी पूर्व सैर के लिए निकल जाती हूँ |                                                       यह पार्क सुनियोजित तरीके से बड़े वृक्षों , छोटे पौधों से सुसज्जित है | इस समय गुलमोहर की बहार है और नीम के वृक्ष नव पत्तों और निम्बोली से आच्छादित हैं | इन वृक्षों को देख कर लगता है - कुदरत की नेकियों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है | जड़ें जितनी गहरी होती हैं , पेड़ का फैलाव भी उतना ही ज्यादा होगा ...