निष्ठा घर के पास मेन रोड पर आ गई। सुबह से रात तक ट्रैफिक की चिल्लपों और उस से उठने वाले गर्द के गुबार और जेठ की तपती दोपहर से हाल बेहाल दिखने वाला यह...शहर। यहां कई दुकानें हैं। वो दिन थे, यहां बहुत भीड़ हुआ करती थी। तीन वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है। दुकानों पर गिने चुने ग्राहक और उबासी लेते दुकानदार। आभासी संसार के माध्यम से खरीदारी का तरीका ही बदल गया है। इसे एक मार्केट स्ट्रेटजी कहें या फिर नया ट्रेंड। बिना घर से निकले--- चुटकियों में खरीदारी हो रही है अर्थात ऑनलाइन शॉपिंग, पर इस से इन दुकानदारों के गल्ले खाली हैं। निष्ठा के कदम एक परचून की दुकान के आगे थम गए। इसकी दुकानदार एक वृद्धा है। निष्ठा ने आगे बढ़कर नमस्ते किया और सामानों की लिस्ट थमा दी, जिसमें तेल, साबुन, दालें,मसाले सभी कुछ लिखे थे। सारा सामान ले कर निष्ठा घर पहुंची। हाथ में सामान देख कर माँ आश्चर्य चकित रह गई। "अरी, मैंने तो तुझे ऑनलाइन ऑर्डर करने को कहा था।" " हाँ, माँ, पर सामने रखी चीजों की खरीदारी करने में चीज बढ़िया मिलती है। इनके स्पर्श का अहसास भी होता है। ऑनलाइन शॉपिंग में यह अहसास कहाँ ? बस, चित्र ...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !