माटी का तन, हर पल लिखे एक नई कहानी, जग मिथ्या, केवल जन्म-मरण की निशानी। आकुल-व्याकुल मन कभी न स्थिर रह पाता है, सपनों की रुनझुन में ही जीवन कट जाता है। ऊपर से संतोष दिखा, फिर भी अंतर प्यासा है, मृगतृष्णा के जाल में फंसा मन घबराता है। सागर में रह कर भी प्यास नहीं बुझती पूरी, जैसे मृग ढूंढता है , जंगल में कस्तूरी। तमाम उन परछाइयों के पीछे हम भाग रहे, प्यास बुझाने को हैं असफल हो रहे। शहर की भागमभाग, जीवन का जंजाल, दूर-दूर तक फैला है, मरीचिका का जाल। जाने कैसी ये मृगतृष्णा, अखंड सुख के चाहत की, हर बार यही सोचा करती, लूँगी अब साँस राहत की। बस , यह आखिरी साध पूर्ण हो जाए , हे प्रभु, मेरी चाहतों पर विराम लग जाए ! पर, फिर एक नई चाह जग जाती, ऐसी अनंत चाहतों के जंजीर में मैं फंस जाती। क्या इन जरूरतों की धूप कभी ढलेगी ? पता नहीं , यह मृगतृष्णा कब तक छलेगी ?
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !