सुलोचना अब बीमार रहने लगी है। उम्र ज्यादा नहीं हुई है, पर गठिया के दर्द से चेहरे पर थकान दिखने लगी है। रामकिशन सेवा निवृत्त हो चुके हैं। घर में बेटा, बहू, पोता, पोती से भरा पूरा परिवार है। सुबह मंदिर जाना और शाम को पार्क जाना - दोनों की दिनचर्या में शामिल है। घर से बाहर निकलो, तो हमउम्रों से, परिचितों से मुलाकात हो ही जाती है। मंदिर की पेढ़ी पर या पार्क की बेंच पर- बतियाने बैठें तो समय का पता ही नहीं चलता। वैसे भी अड़ोस-पड़ोस की खबरों में सुलोचना का मन बहुत लगता है। आज काफी दिनों बाद मंदिर में देविका दिखाई दी। कुछ अस्वस्थ और परेशान लगी। सुलोचना ने पूजा की, परिक्रमा लगाई और बैठ गई-मंदिर की सीढ़ी पर। स्वाभाविक है- देविका के हाल चाल जानने हैं। मंदिर की सीधी पर बैठना देविका के भी नियम में है। बैठ गई सुलोचना के बगल में। "देविका, क्या बात है ? बहुत थकी लग रही हो? तबियत तो ठीक है ना! भाईसाहब कैसे हैं ?" "सब ठीक है। बस, काम का जोर ज्यादा रहा, सो थकान हो गई।" "क्यों बहू ना है घर में ?" "ना, बहू अलग हो गई। बेटे ...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !