प्रिया के सिर पर पट्टी बँधी है, पता नहीं, वह अस्पताल कैसे पहुँची! हाँ, थोड़ी धूमिल याद है- मकान की लिफ्ट खराब थी, बाजार से सामान लाई थी। दूसरे मंजिल तक ही जाना था- लिफ्ट कब तक ठीक होगी, पता नही। 4 वर्षीया बेटी रोली के साथ सामान हाथ में ले कर सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। पैर फिसला और गिर पड़ी थी। अपने सामने पड़ोस वाली शकुंतला जी को देख कर हतप्रभ रह गई। आसपास नजरें दौड़ाई, रोली दिखाई नहीं दी। प्रिया में थोड़ी हलचल देख कर शकुंतला जी पास आई, बोली-" क्या तुम अपनी बिटिया को ढूंढ रही हो ? वह मेरे पति के साथ बाहर बैठी है, उनसे कहानी सुन रही है।" प्रिया अपराधबोध से नजरें झुकाए रही। शकुन्तला जी ने पूछा- "तुम्हारे पति कहाँ हैं?" प्रिया- "वे ऑफिस के टूर पर गए हुए हैं, दो दिन में लौट आएंगे।" पिछले महीने ही शकुन्तला जी अपने पति के साथ प्रिया के बगल वाले फ्लैट में रहने आई थी। वे जब कभी बालकनी में प्रिया को देखती, मुस्कराती, पर प्रिया निरुत्तर ही घर के अंदर चली जाती। घर के बाहर भी जब कभी शकुन्तला जी का प्रिया से आमना- सामना हुआ, प्रिया ने अनदेखा ही...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !