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Showing posts from 2022

अद्भुत संयोग

           आज घर में जोर शोर से तैयारी चल रही है। आज फिर रीमा को देखने लड़का आ रहा है। यह कोई पहली बार तो है नहीं। कई बार लड़के आए, देख गए। एक बार तो रिश्ता तय हो गया था, पर सच्चाई से परिचित कराते ही रिश्ता टूट गया। रीमा सोचती है- पहली मुलाकात में ही सत्य से अवगत करा दें, तो ऐसी नौबत ही न आए। उसका खुद का दृष्टिकोण स्पष्ट है। रीमा विवाह को अनिवार्य नहीं मानती है, पर माता-पिता मानते हैं, तो प्रयत्न जारी है। एक बार रीमा ने माँ से पूछा था- "आप लोगो ने मुझे एम ए, बी एड करा दिया। क्या विवाह करना जरूरी है?"  माँ का जवाब था- "हर काम का एक वक्त और रिश्ते की एक जरूरत होती है। वह रिश्ता हमारी जिंदगी में न हो तो आज नहीं तो कल हमें इसकी कमी खलती ही है।" बस इसके आगे बोलने की गुंजाइश ही नहीं थी। उनके कहे अनुसार प्रयास जारी है। रीमा ने भी सोच लिया है- वह अपनी एक कमी से हार नहीं मानेगी। आज रोहिणी जीजी भी आई हैं। उन्होंने अख़बार में विज्ञापन पढ़ा था- एक सुशील और गुणी वधू चाहिए। लड़का इकोनॉमिक्स में डॉक्टरेट है और यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है। रोहिणी ने फोन पर पूछ लिया था- 'दह...

मील का पत्थर

मैं मील का पत्थर हूँ, मैं संकेत वाहक, दिशा निर्देशक हूँ। मिट्टी से लिपटा, जमीन में आधा गड़ा, अब भी वहीं, जहाँ कल था खड़ा। मैं पाषाण हूँ, पर पथ-दृष्टा हूँ, एक मंजिल तक पहुँचने का सोपान हूँ। मुझ में गति कहाँ, पर निगाहें थम जाती हैं, मुझे देख सबकी गति बढ़ जाती है। मैं निर्जीव, असहाय, मूक हूँ, खुद गुमनाम, पर लोगों का सुनिश्चित पता हूँ। हो गया हूँ पत्थर, हर मौसम से पथराते, देख रहा हूँ, राहगीरों को आते-जाते। मैं खड़ा तटस्थ, एक शिला हूँ, पर 'चलते रहो' का संदेश देता हूँ। ऐसा भाग्य कहाँ, इस शिला से मुक्ति पा लूँ, किसी के चरण-रज पाकर, मानव रूप जी लूँ!

मर्यादा

          मेरे बेटे अश्विन से चूक कैसे हो गई? आज धमकियों के कॉल आ रहे हैं। परेशान हो कर मोबाइल ही बंद कर दिया। क्यों नहीं सीख पाया- व्यवहारिकता- हमारे दिए संस्कारों से। प्रोफेसर का पद एक जिम्मेदारी का पद है- देश और समाज के भविष्य की जिम्मेदारी। एक गंवार को होनहार साबित कर दिया- नोटों के लिफाफे के वजन से। आत्मा धिक्कारती तब तक देर हो चुकी थी। अब लालच दे कर कई बेक़ाबिल विद्यार्थियों के नम्बर बढ़ाने के धमकी भरे फोन आ रहे हैं।           मैं भी एक टीचर थी। मेरे माँ पिताजी भी टीचर थे। उनके आदर्श और संस्कार मेरे खून में पूरी तरह बस गए थे। मैंने पढ़ाई के दौरान ही तय कर लिया था- बच्चों को पढ़ाऊंगी। एक शिक्षक होना- मतलब समाज, देश के उत्थान में योगदान। कोई और पेशा सोचा नहीं, समझा नहीं। अकेली संतान होने के नाते माँ पिताजी का ध्यान मुझ पर ज्यादा केंद्रित रहा। जब तक सम्भव हुआ, दोनों स्कूल में पढ़ाते रहे। बाद में सेवनिवृत्ति ले कर घर पर रह कर ही बच्चों को पढ़ाने लगे। आदर्श शिक्षक के रूप में दोनों को सम्मान भरपूर मिला। अपने ही एक होनहार विद्यार्थी से मेरा विव...

मेरा घर

          दो कमरों का छोटा सा घर और बीच में एक ईंट की पतली दीवार। एक कमरे में मम्मी- पापा और दूसरे कमरे में स्वाति और दादी। स्वाति ने दादी को कभी काम करते हुए नहीं देखा, पर उनकी हुकूमत सदा कायम रही। मम्मी हर काम के लिए, हर व्यक्ति के लिए हमेशा तैनात रहती। पापा को गुस्सा बहुत जल्दी ही आता था। उस दिन पापा के चिल्लाने की आवाज से स्वाति डर गई। पापा दहाड़ रहे थे- " मेरे घर में रहना है, तो मेरे तरीके से रहो, वरना निकल जाओ यहाँ से।" दादी ने तो मुँह तक चादर ढक कर सोने का स्वांग रच लिया था। छह वर्षीया स्वाति अपने कमरे में दीवार से चिपक कर खड़ी हो गई-' इतनी रात को मम्मी कहाँ जाएंगी? मैं उनके बिना कैसे रहूँगी? क्या पापा मुझे और दादी को अकेले संभाल लेंगे!' एक कड़ी की तरह कई प्रश्न दिमाग में उठते गए। स्वाति  परदे की आड़ में झांकती रही। होंठों को भींचे, गम को पीती हुई मम्मी खाना खा रही थी। एक एक निवाला धीरे धीरे उनके हलक से उतर रहा था। थोड़ी देर में कमरों की बत्ती बंद हो गई। स्वाति भी सो गई। सुबह आंख खुली, देखा- मम्मी रोज की तरह काम में लगी हैं। पापा ऑफिस चले गए, दादी मंदिर। ...

मैं काला रंग

लाल, पीला, सफेद सभी रंगों का भाई हूँ, मैं काला हूँ। यूं न देखो मुझे तल्ख नजरों से, मैं भी तो एक रंग हूँ। भूलो ना- तुम्हें काला टीका लगा माँ बुरी नजरों से बचाती, काला धागा पहना तुम्हें है सुरक्षित मानती। काले बोर्ड पर लिख अक्षर तुम्हारा जीवन संवरा,  सफेद पन्नों पर काला अक्षर ही अद्भुत निखरा। सोचो तो- काले मेघा देख क्यों किसान है नाचता, बरसने पर लहलहाती फसल देख इतराता। झमाझम बरस कर तुम्हें तपिश से बचाता हूँ। बहते पानी से धरती की प्यास बुझाता हूँ। मानो ना- काली कोयल की कुहू कुहू का रसपान करते हो, गोरी की आंखों में देख काजल मुग्ध हो जाते हो। जिस रंग में मिल जाता हूँ, गहरा कर देता हूँ। जहां भी हो फीकापन, अपनी धाक जमाता हूँ। गौर करो- आसमां हो काला तो तारे भी लगते सुंदर, कान्हा भी तो अपने रंग से कहलाए श्यामसुंदर। सिर के सफेद बालों से तुम क्यों हो परेशान भला, कर खिजाब के हवाले, बालों को करते हो काला। विनती है- अन्य रंगों से अलग कर, न करो भेदभाव, तन बदन हो काला, तो  करो न दुराव। भला, हुनर कभी रंगों में हैं बसते, जी, हुनर से तो रंग ही हैं सजते।

एक माँ- ऐसी भी

            यह मकान दिनेश ने बहुत तरीके से और सुविधाजनक बनवाया है। एक कमरे में टांड़ बना हुआ है। साल भर, बहुत कम काम आने वाला सामान इसमें रख दिया जाता है। दिन में घर का दरवाजा और खिड़की हमेशा खुले ही रहते हैं, मां- पिताजी आगे के कमरे में बैठे ही रहते हैं। दिशा ने गौर किया- गर्मी बहुत हो रही है, अब रसोई में मटका रखना पड़ेगा। टांड़ पर मटका रखा हुआ है। दिशा ने सीढ़ी लगाई और टांड़ में जा कर मटका खोजने लगी।। दिशा को किसी के कुसमुसाने की आवाज आई, वह घबरा गई। चारों तरफ नजर दौड़ाई। एक टोकरी में बिल्ली के 4 नवजात बच्चे हैं। हे भगवान, यहां बिल्ली कब आई और कब बच्चे जन गई? कुदरत का करिश्मा देखो- न अस्पताल भागी, न डॉक्टर, न दाई की मदद ली। कितनी सुरक्षित जगह ढूंढ कर प्रसव किया। पर माँ दिख नहीं रही है। दिशा मटका ले कर नीचे आ गई। वह जानती है- अपने बच्चों को संभालने माँ जल्दी ही आएगी। दिशा ने हॉल में आकर माँ बाबूजी को बता दिया। दोनों मुस्करा दिए, बाबूजी बोले -"खिड़की के रास्ते से बिल्ली आई होगी, बच्चों को ले जाएगी। दिशा तुम धीरे से टोकरी को नीचे ले आओ और पलंग के बगल में रख दो, उसे ...

स्मार्ट कौन

"दादी, आज अपनी अलमारी की सफाई कर रही हो क्या? ये कागजों का पुलिंदा ! क्या है ये सब?" "अरी, इसे पुलिंदा मत बोल, अमूल्य निधि है ये ।" " दादी, आपने कुछ इन्वेस्ट किया था क्या? एफ डी के कागज हैं क्या?" " ना, राशि बेटा, ये पुरानी चिट्ठियाँ हैं। मेरी माँ, पिताजी, तेरे पापा की, तेरी मम्मी की, तेरे दादा जी की- सभी हाथ से लिखी हुई। एफ डी से ज्यादा कीमती हैं।" "अच्छा दादी, यह बताओ, पहले चिट्ठियाँ डाक से कितने दिनों में मिलती होंगी? यहाँ तो व्हाट्सअप या मेल में तुरन्त पहुंच जाती हैं।" "हाँ, चार-पाँच दिन में मिलती थी और लिखने वाला भी लिखने में समय लगाता था। शब्दों को, अपनी भावनाओं को करीने से जमा कर वाक्य बनाता था। पत्र को पाने वाला भी पत्र को चार बार पढ़ता था।" "दादी, ऐसा करते हैं, आज हम दोनों इस विषय पर ही बात करेंगे। आपने बिना मोबाइल, कंप्यूटर के जीवन बिताया और मैं मोबाइल, कंप्यूटर के बिना जीवन अधूरा समझती हूं।" दूसरे कमरे में बैठे राशि के मम्मी-पापा इन दोनों की बातें सुन रहे थे, वे मुस्करा दिए। वे जानते हैं- दादी-पोती कभी ३६ क...

संचय

            मैं मध्यम वर्गीय परिवार का एक साधारण इंसान। मुझे बचपन से ही जरूरत से ज्यादा 'संचय' पसन्द नहीं। खर्च के मामले में मैंने हमेशा जरूरी सामानों को ऊंची फेहरिस्त में रखा। मेरी पत्नी का स्वभाव मुझ से विपरीत तो नहीं कहा जाएगा, पर हाँ, बिल्कुल अलग है। वह आधुनिक विचारों की है। जिसे मैं 'संचय' कहता हूँ,  वह स्टेटस को बनाए रखने के लिए उन्हें इकट्ठा करना जरूरी समझती है।             काफी दिनों से मैंने कपड़े नहीं खरीदे थे। पत्नी के वाक्य से मैं मुस्करा दिया- " तुम्हारे पास गिनी चुनी शर्ट हैं, जिन के कारण तुम्हें लोग पीछे से ही पहचान जाते हैं। तुम इन कपड़ों से बोर नहीं हुए क्या? कल हम बाजार जाएंगे और आपके लिए 4-5 शर्ट खरीदेंगे।" बड़ी मान मुन्नवत के बाद मैं बाजार जाने को राजी हुआ, पर मैंने अपनी भी एक शर्त रख दी- "सिर्फ तीन शर्ट खरीदूंगा। वे भी ज्यादा महंगी नहीं होनी चाहिए।" मैंने पत्नी की पसंद के रंग और अपनी पसंद के दाम की तीन शर्ट खरीद लीं। दुकान से बाहर निकले, अंधेरा होने को था। जोरों की हवा चल रही थी, ठंड लगने लगी। हम कार में ...

आईना

सोचा, हूँ उम्रदराज, व्यर्थ है देख आईना, सप्ताह बीते, बीते मास, केके रोज देख आईना। खुद को न पहचान पाई, आईने को ही शत्रु पाया, चेहरे की उभरी झुर्रियों से, खुद को कीर पाया। करती रही चेहरे का घर्षण, परतें लगाई अनेक, जुल्फों को दे नया रूप, आई लबों पर तबस्सुम। बेतरतीबी ही सही, मुखमंडल खूबसूरत दिख गया, आईना दिखा गया समय की नजाकत, खुद को अमीर पाया। काश, हम जो चाहते, वो दिखाता आईना। काश, दाएं को बायां न दिखाता आईना। काश, मन पर लगी खरोंचे ही दिखा देता आईना। काश, सूरत की जगह सीरत दिखा देता आईना। हे प्रभु, कोई आईना ऐसा हो,                जो चेहरा नहीं किरदार दिखा दे। जो चेहरों पर दिखाते मुस्कान,                उनके दिलों का फरेब दिखा दे।