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Showing posts from January, 2021

रोजा

            कुछ वर्षों पहले की बात है। वाकया भूल नहीं पाती हूँ-जीवन के फर्ज और मूल्यों को सीखने का सबक मिला। मैं किसी काम से सिकन्दराबाद गई थी। वहीं मेरी सहेली रशीदा रहती है। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार उसके यहां मैं दो दिन रुक गई। रमजान का महीना था। मुझे पता था रोजे चल रहे हैं। मुझे उत्सुकता थी- इनके रीति-रिवाजों को जानने की। रशीदा के परिवार में उसका पति, बेटी शानू और अम्मी (सास)। पड़ोस में ही रशीदा के देवर साजिद का परिवार रहता है। रशीदा ने बताया- 'अम्मी हमेशा अल्लाह की इबादत में लगी रहती हैं, पर आधुनिक और खुले विचारों की महिला हैं।'  इनकी दी हुई शिक्षा दोनों परिवारों के संस्कारों में मुझे दिख रही थी। अम्मी मेरा बहुत ध्यान रखती। उन्होंने मेरे खाने-पीने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। शाम एलान हो गया था-कल शानू और रोशन ( साजिद का बेटा) रोजा रखेंगे। दोनों बच्चे 9-10 वर्ष के रहे होंगे, पहली बार रोजा रखेंगे। दोनों बहुत खुश थे। उन्हें अहसास हो रहा था, मानो रोजा रख कर वे बड़ों की श्रेणी में गिने जाएंगे। दोनों को बता दिया-सुबह चार बजे सेहरी दी जाएगी। कौतूहलव...

कर्त्तव्य की वेदी

            रागिनी सुबह से काम में जुटी है। काम है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेते! हर पल निगाह घड़ी पर जाती है। साढ़े नौ बजे घर से निकलना है। आज दोनों का नौकरी करना जरूरी हो गया है, वरना खर्चे कैसे पूरे हों? बच्चों की पढ़ाई के लिए शहर में आ गए। गाँव में मां- बाबूजी। भला एक की कमाई से जिम्मेदारियों का निर्वहन कैसे हो?  कभी कभी रागिनी के मन में विचार आता है कि सुचिता कितनी खुशनसीब है, कुँवारी है, हमेशा अपनी कमाई खर्च करने में पूरी स्वतंत्र है। हम तो अपने परिवार के खर्चों में अपनी इच्छाएं ही दबा लेते हैं।             रागिनी समय पर ऑफिस पहुंच गई। अरे, यह क्या? आज भी सुचिता नहीं आई। तीन दिन से सुचिता ऑफिस नहीं आ रही है। रागनी ने सुचिता को फोन किया, जवाब मिला- 'कुछ जरूरी काम है, दो दिन और नहीं आ सकूंगी।' सुचिता सदा चुटकुले छोड़ने वाली, स्मार्ट और मेहनती लड़की। फोन रखने के बाद रागिनी का मन विचलित हो गया। तीन दिन से ऑफिस में नीरसता छाई हुई है , अभी दो दिन और! रागिनी ने जरूरी काम खत्म किए और ऑफिस से सुचिता के घर का पता ले कर जल्दी ही ...