कुछ वर्षों पहले की बात है। वाकया भूल नहीं पाती हूँ-जीवन के फर्ज और मूल्यों को सीखने का सबक मिला। मैं किसी काम से सिकन्दराबाद गई थी। वहीं मेरी सहेली रशीदा रहती है। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार उसके यहां मैं दो दिन रुक गई। रमजान का महीना था। मुझे पता था रोजे चल रहे हैं। मुझे उत्सुकता थी- इनके रीति-रिवाजों को जानने की। रशीदा के परिवार में उसका पति, बेटी शानू और अम्मी (सास)। पड़ोस में ही रशीदा के देवर साजिद का परिवार रहता है। रशीदा ने बताया- 'अम्मी हमेशा अल्लाह की इबादत में लगी रहती हैं, पर आधुनिक और खुले विचारों की महिला हैं।' इनकी दी हुई शिक्षा दोनों परिवारों के संस्कारों में मुझे दिख रही थी। अम्मी मेरा बहुत ध्यान रखती। उन्होंने मेरे खाने-पीने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। शाम एलान हो गया था-कल शानू और रोशन ( साजिद का बेटा) रोजा रखेंगे। दोनों बच्चे 9-10 वर्ष के रहे होंगे, पहली बार रोजा रखेंगे। दोनों बहुत खुश थे। उन्हें अहसास हो रहा था, मानो रोजा रख कर वे बड़ों की श्रेणी में गिने जाएंगे। दोनों को बता दिया-सुबह चार बजे सेहरी दी जाएगी। कौतूहलव...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !