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Showing posts from 2023

लकीरें

हर एक लकीर दे रही पहचान, जहां से गुजरी छोड़ गई निशान। एक लकीर क्या खिंच गई, हिस्सों में बांट कर चली गई। काश, खिंचती लकीर जोड़ने के लिए, पूरे जहान को समेटने के लिए। कभी फुर्सत में हथेलियां तकती हूँ, इन आड़ी तिरछी लकीरों को देखती हूँ। क्या इन उलझी लकीरों में लिखी है किस्मत,  पर जिनके नहीं हैं हाथ, उनकी भी होती है । किस्मत। पत्थर पर लकीर खिंच गई, मानो मन के संकल्प को जता गई। माथे पर पड़े बल बन गई लकीरें, हाव-भाव दर्शाते ये सल, लकीरें। हर लकीर बोल रही है एक जुबाँ, चेहरे पर झुर्रियां जता रही तजुर्बा। लकीरों का क्या? आकार, रूप बदल जाता है, कर्म हर लकीर को बदल देता है।

अस्तित्व

           आज घर में भूचाल आ गया है। सुबह ही सुशीला ने ऐलान कर दिया है- वह कॉलेज में दाखिला लेंगी। पति रमाकांत बोले-" तुम अपनी उम्र जानती हो ना! पचास वर्ष की हो गई हो। तुम्हारी उम्र बनारस, हरिद्वार जाने की है, न कि कॉलेज जाने की।" "पढ़ाई के लिए भला कोई उम्र होती है, मैंने फैसला कर लिया है।" "सुशीला, एक कहावत है- बूढ़े मुंह आए मुंहासे या सींग काटकर बछड़े में शामिल होना। तुम्हें शर्म नहीं आएगी।" "अजी शर्म तो तब आई जब इंटर पास होते ही शादी कर दी गई तब 18 वर्ष की थी। तीन वर्षों में 2 बच्चों की माँ। अब 2 बच्चों की दादी, 2 बच्चों की नानी।" बेटा- "माँ, आप कॉलेज जाओगी, तो घर कौन संभालेगा?" सुशीला- "इस टप्पर को संभालने का ठेका मेरा ही है क्या? अपने बच्चे खुद पालो, यह भी कोई बात हुई!" बहू- "माँ, क्यों न आप correspondance कोर्स से BA कर लो।" "ना, बिल्कुल नहीं, मैं अपने सहपाठियों के साथ पढ़ना चाहती हूं। मैं अपनी सारी जिंदगी खुद को अलग अलग भूमिकाओं में फिट करती रही, लेकिन इन सब में मैं कहाँ हूँ? अब मैं अपने अस्तित्व की पहचान बना...

परफेक्ट मदर

           कल माँ जी (मेरी सास) के पास उनकी एक शुभचिंतक सहेली आई। बातों- बातों में कह गई- 'मेरी बहू से अपने बच्चे ना संभलते।' माँ जी ने कह दिया- 'तो तुम थोड़ा सहारा लगा दिया करो।' बात वही खत्म हो गई। अपने बच्चे ना संभलते- कहने का तातपर्य यही कि वह एक जिम्मेदार माँ नहीं है। क्या अपनों से सर्टिफिकेट की जरूरत है? किसे अधिकार है यह तय करने का कि फलां महिला अच्छी माँ है या नहीं।            आज एक फ़िल्म देखी- 'मिसेस चटर्जी वर्सेज नॉर्वे'। यह एक सत्य घटना पर आधारित है। नॉर्वे में रह रहा भारतीय परिवार नॉर्वे के तौर तरीकों और कानून से अनभिज्ञ था। एक भारतीय माँ अपने बच्चे को गलती करने पर पिटती है- जिसे अत्याचार माना गया। दाल चावल चम्मच की बजाय हाथ से खिलाना पसन्द करती है- जिसे जबरन ठूंसने की उपमा दी गई। कई काम हैं, जिन्हें हर देश की माँ अपने बच्चे के साथ करती है। भारतीय संदर्भ में ये बातें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन नॉर्वे में यह कानून का उल्लंघन है, वहाँ चाइल्ड वेलफेयर सर्विस इन मातृ- दुलार का विरोध करती है और ऐसी माँ को अनपरफेक्ट मदर का ...

असली श्रद्धांजलि

          जीवन वैसे ही चल रहा है। रोज के काम नियमित रूप से हो रहे हैं। कमी है तो पापा की। आज 2 तारीख को पापा का उठावना है, शाम को श्रद्धांजलि बैठक रखी गई है। मैं पापा के शौक कभी भूल नहीं सकता! सबेरे गाढ़े दूध की चाय पीना, अखबार किताबें पढ़ना, थोड़ी कसरत करना, नहा कर प्रेस के कपड़े पहनना और सोते समय एक गिलास दूध पीना। वे मुझे हमेशा कहा करते- 'कमाते हो, अच्छा खाओ, अच्छा पिओ, अच्छा पहनो, जीवन स्तर ऊँचा रहे, इसलिए शारीरिक- मानसिक कसरत करते रहो।' सुबह उठते ही मेरे हाथ में अखबार आया, तारीख पर ध्यान गया। मुँह से निकला- "निर्मला, बहुत बड़ी गलती हो गई। दूधवाले काका, प्रेस वाली अम्मा, अखबार वाले भैया को पिछले महीने के रुपये नहीं दिए। अभी तीनों के रुपए निकाल दो। उन्हें फोन करके बुला लेता हूँ।" पास खड़े चाचा जी सुन रहे थे, बोले- "अरे इसमें गलती कैसी? आज उठावना हो जाय फिर हिसाब कर देना।"           "नहीं, चाचाजी। पापा इन तीनों की बहुत इज्जत करते थे। हम दोनों वर्किंग हैं, कई बार हम दोनों को बाहर जाना पड़ता था। गर्मी, सर्दी, बरसात कैसा भी समय रहा हो, ये तीनों ...

मेरी मंजिल

ढूंढ रही हूँ, कहाँ है मंजिल खबर नहीं, पस्त हो चुके हैं पांव,आसान ये सफर नहीं। कदमों ने नापा हर डगर, हर मंजर, आंखों को नहीं दिखा कभी मील का पत्थर। मंजिल की जुस्तजू में झोंक दिया सारा दमखम, बेताब तमन्नाओं की कसक रही हरदम। शिद्दत से मुकाम की चाहत ने जुटा दिया,  कभी सुना-अंधेरों ने सबेरा होने न दिया? न बैठूंगी आशियां में परों को समेटकर,  अभी भी इतनी जान है खुले हैं मेरे पर। रहेगा हौसला, खुली फिजाओं में उड़ान का, खुद से वादा है, मंजिल तक चलते रहने का। मेरी मंजिल- सुकून इतना हो सुख से जिंदगी चल जाए, दुख इतना हो कि शांति से झेल पाएं। रिश्ते इतने गहरे हों प्यार से निभा पाएं, मंजिल इतनी ऊँची न हो 'अपने' ओझल हो जाएं।

अच्छा दोस्त

     सिया और राघव के विवाह को 6 महीने हो गए। सिया को याद नहीं, दोनों साथ में कभी मॉर्निंग वॉक को गए हों या रात में टहलने को। अमूमन डिनर के बाद कई जोड़े बाग- बगीचे में टहलते दिख ही जाते हैं। सिया कई बार इच्छा जाहिर कर चुकी, पर राघव पर कोई असर नहीं। सिया ने सोच लिया- आज तो राघव से बात करनी होगी-" तुम रोज सुबह-शाम 2-2 घंटे क्लब में जाते हो, आज मैं भी चलूंगी तुम्हारे साथ।" "क्यों, मैंने कल तुम्हें रुपए दिए थे, जाओ, शॉपिंग कर आओ।" "हर चौथे दिन नए कपड़े, कॉस्मेटिक्स खरीदने का क्या फायदा, जब कहीं जाना ही नहीं !" "किसने कहा तुम घर बैठी रहो, अपनी सहेलियों के साथ समय बिताओ। भैया- भाभी, बच्चों के साथ घूमो।" "पर मुझे तुम्हारे साथ घूमना है।" "तुम जानती हो- मैं सुबह शाम क्लब जाता हूँ और दिन में फैक्टरी।" "तो आज मैं भी क्लब चलती हूँ।" "नहीं, वहाँ सब तरह के लोग आते हैं, तुम्हारा जाना सही नहीं।" "वे सब तुम्हारे दोस्त ही हैं ना! कइयों की तो पत्नियां भी आती होंगी।" "तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! वे शराब पीती हैं...

आत्मग्लानि

          प्रिया के सिर पर पट्टी बँधी है, पता नहीं, वह अस्पताल कैसे पहुँची! हाँ, थोड़ी धूमिल याद है- मकान की लिफ्ट खराब थी, बाजार से सामान लाई थी। दूसरे मंजिल तक ही जाना था- लिफ्ट कब तक ठीक होगी, पता नही। 4 वर्षीया बेटी रोली के साथ सामान हाथ में ले कर सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। पैर फिसला और गिर पड़ी थी। अपने सामने पड़ोस वाली शकुंतला जी को देख कर हतप्रभ रह गई। आसपास नजरें दौड़ाई, रोली दिखाई नहीं दी। प्रिया में थोड़ी हलचल देख कर शकुंतला जी पास आई, बोली-" क्या तुम अपनी बिटिया को ढूंढ रही हो ? वह मेरे पति के साथ बाहर बैठी है, उनसे कहानी सुन रही है।" प्रिया अपराधबोध से नजरें झुकाए रही। शकुन्तला जी ने पूछा- "तुम्हारे पति कहाँ हैं?" प्रिया- "वे ऑफिस के टूर पर गए हुए हैं, दो दिन में लौट आएंगे।"           पिछले महीने ही शकुन्तला जी अपने पति के साथ प्रिया के बगल वाले फ्लैट में रहने आई थी। वे जब कभी बालकनी में प्रिया को देखती, मुस्कराती, पर प्रिया निरुत्तर ही घर के अंदर चली जाती। घर के बाहर भी जब कभी शकुन्तला जी का प्रिया से आमना- सामना हुआ, प्रिया ने अनदेखा ही...

एक कथा- पढ़ी अच्छी लगी

भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ध्यान मग्न थे, आंख खोली तो शनि को अपने सामने पाया। शिवजी ने शनि के आने का कारण पूछा।  शनि बोले- " प्रभु, मैं आप पर आना चाहता हूं।" भोले बाबा बोले-" अरे शनि , तू कहीं और चला जा, मुझ पर आकर क्या करेगा? शनि- "मैंने भी ठान लिया है, मैं तो आऊंगा ही!" महादेव- "क्यों जिद करता है? मैं तो वैसे भी औघड़ हूँ। मेरा क्या है! पार्वती को उसके मायके छोड़ आऊंगा। गणेश और कार्तिकेय भी अपने नाना नानी के यहां रह लेंगे। रहा नंदी, तो उसे किसी आश्रम में छोड़ दूंगा। मैं तपस्या में लीन रहूँगा। तू मुझ पर आ भी गया तो मुझ पर कोई असर नहीं पड़ेगा।" मुस्कराते हुए शनि बोले- " प्रभु, आप कहते हो कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन असर तो पड़ चुका है।" आशुतोष बोले- "वो कैसे ? मैं तो निश्चिंत हूँ।" शनि- " महादेव, असर कैसे नहीं पड़ा ! अभी तो मैंने कहा ही है। अभी आया नहीं हूँ और आप अपने परिवार का बँटवारा करने लगे। सभी को इधर उधर करने लगे। खुद तपस्या के लिए तैयार हो गए। अब आपका यह हाल है, तो मनुष्यों का क्या होता होगा !" शनि की बात सुन कर महादेव हँस पड़े...

मेरे अंतर्मन की आवाज

कसमसाते विचार, घुटती साँसे, एक कसक कुछ न कर पाने की,  खुद से करते अनगिनत सवाल,  बेड़ियों के बंधन की यह पीड़ा,  दबी सिसकती हुई यह चुप्पी।                              यही है अंतर्मन का द्वंद्व। समाज की सच्चाई का प्रतिबिंब हूँ, रही विवशता मेरे व्याकुल मन की, अनचाहे ढंग से कह दी अनकही बात, वेदना का स्वर क्यूं कर कचोट रहा, भीतर तमस घनघोर गहरा गया।                              यही है अंतर्मन की व्याकुलता। बदलती जिंदगी मुझे जीना सीखा रही, हुआ कलुषित विकारों का प्रस्थान, सच-झूठ के फर्क का हो रहा है ज्ञान, भीतर की आवाज कर रही सजग, अब आँखे मूंद, उसे सुन ही लूँगी।                                मेरे अंतर्मन की आवाज।

यह कैसा दोष

          रमेश का ग्रेजुएशन हो गया था। वह आगे पढ़ना चाहता था, पर पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। व्यापार को संभालने के लिए पिताजी को सहयोग देना जरूरी था। छोटा भाई राजीव आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जा चुका था। पिताजी स्वस्थ हो गए, पर रमेश की पढ़ाई पर पूर्ण विराम लग ही गया। विवाह हो गया, जिम्मेदारी बढ़ गई। राजीव ने पढ़ाई पूरी करने के बाद विदेश में ही नौकरी कर ली। मां- पिताजी की पसंद की लड़की रश्मि से राजीव का विवाह हो गया। जब कभी राजीव भारत में रहता, परिजनों के प्रति अपार प्रेम उमड़ ही जाता। माँ दोनों बेटों  को साथ देखती तो कहती-"तुम दोनों मेरे राम लक्ष्मण हो।" ,विवाह के थोड़े दिन बाद राजीव, रश्मि विदेश  चले गए। वहीं के हो कर रह गए। राजीव ने बिज़नेस शुरू कर लिया- दोनों व्यस्त हो गए, परिवार बढ़ा, सब वहीं के रहन सहन में ढल गए। माँ बीमार हुई, बिस्तर पकड़ लिया। राजीव को खबर कर दी थी, पर उसने अपने नए बिजनेस का हवाला दिया और नहीं आया। माँ के देहांत पर भी नहीं आया। पिताजी के प्रति रमेश की जिम्मेदारी बढ़ गई। लोग कहते है - वे एक अच्छे परिवार से हैं। सवाल यह कि अच्छा परिवार बन...