हर एक लकीर दे रही पहचान, जहां से गुजरी छोड़ गई निशान। एक लकीर क्या खिंच गई, हिस्सों में बांट कर चली गई। काश, खिंचती लकीर जोड़ने के लिए, पूरे जहान को समेटने के लिए। कभी फुर्सत में हथेलियां तकती हूँ, इन आड़ी तिरछी लकीरों को देखती हूँ। क्या इन उलझी लकीरों में लिखी है किस्मत, पर जिनके नहीं हैं हाथ, उनकी भी होती है । किस्मत। पत्थर पर लकीर खिंच गई, मानो मन के संकल्प को जता गई। माथे पर पड़े बल बन गई लकीरें, हाव-भाव दर्शाते ये सल, लकीरें। हर लकीर बोल रही है एक जुबाँ, चेहरे पर झुर्रियां जता रही तजुर्बा। लकीरों का क्या? आकार, रूप बदल जाता है, कर्म हर लकीर को बदल देता है।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !