जिंदगी के सफर में हर लम्हे हैं अलबेले, मंजिल तक जाना ही होगा अकेले। पथ पथरीले, कंटीले रहे, पाए मैंने छदम, ठोकर खा गिर भी गई, बढ़ते रहे कदम। महफूज हो रास्ते, खुशियों भरा हो जीवन, इसी जद्दो-जहद में भटका यह मन । कभी रास्ता रहा सूना, तन्हा सफर रह गया, लगा, यकीनन मेरा कारवां ही बदल गया। नोट के मोह में मैं अटकी रह गई, कोल्हू के बैल सी फंसती चली गई। स्मार्ट फोन, कंप्यूटर के कशिश से नहीं बच पाई, जिंदगी की आपाधापी में जीना ही भूल गई। सफर में धूप है, तपना तो होगा ही, भीड़ बहुत है, रास्ता तो बनाना होगा ही। नई डगर पर नई मुश्किलें तो होंगीं ही, सफर है लम्बा, संभावनाएं बढ़ानी होंगीं ही। जरूरी नहीं, जिंदगी के सफर में हो रफ्तार, पर बना रहे संतुलन, हो यह एतबार। रहूँ स्वस्थ, यह करती रही सदा बंदगी, 'उस' मोड़ पर खत्म होने वाला, सफर है जिंदगी।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !