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Showing posts from 2020

और आसमां

          सारे दिन अम्मा सभी को हिदायत दिया करती थी- 'बाहर के हॉल में पंखा कोई नहीं चलाएगा। जरूरत क्या है? कमरे में कई खिड़कियाँ हैं, कमरा हवादार है।' दरअसल घर के आसपास के कई पेड़ हैं, उन पर चिड़ियां चहचहाती रहती हैं। घर में एक खिड़की से घुसती हैं, दूसरी से निकल जाती हैं। पंखा चल रहा हो तो चिड़िया के घायल होने का डर बना रहता है। अम्मा की निगाह कभी चलते पंखे पर चली जाती तो घर में कोहराम मच जाता। अम्मा गुजर गई, पर उनकी हिदायत हमारी आदत बन गई। कभी पंखा चलाने की ओर ध्यान ही नहीं गया।             कुछ दिन पहले बेटे रोहन के दोस्त आए। दोस्तों को हॉल में बिठाकर रोहन मेरे पास आया। तब तक उसके दोस्त ने पंखा चला ही लिया। हुआ वही जिसका हमेशा डर रहता है। एक चिड़िया घायल हो गई। मैंने तुरंत चिड़िया को हथेली पर लिया, पंख पर चोट थी। मैंने मरहम लगाया। चिड़िया की चूं-चूं में घुला करुण क्रंदन मुझे बैचेन कर रहा था। बाहर भी कुछ चिड़िया ज्यादा चहचहाने लगी थी। परिवार के सदस्य की व्यथा वे जाहिर कर रही थी। संवेदना और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए भाषा की जरूरत नहीं होत...

चुनौती

खुशनुमा दौर चल रहा था, सफर का, सबक अधूरा ही था, अभी जिंदगी का। कैरोना ने डेरा डाल, सब कुछ हिला दिया, आपदा के दौर ने हमें जीना सिखा दिया। जीवन पथ चुनौती दे रहा, हर कगार पर, अंगारों का क्या भय, जब चलना हो इसी पथ पर। इस छुपने-छिपाने के खेल में कितने ही ढह गए, कुछ तूफान की आहट से ही बिन बरसात बह गए। पर्दा आंखों से हमने झूठी उम्मीदों का गिरा दिया, झूठी लालसाओं के बंधन से खुद को मुक्त करा लिया। हवा का रुख देख मैंने नाव के पाल को थाम लिया,  घर में रहे सिमटे, पर रिश्तों को मजबूत बना लिया। जब दौर हो गर्दिश का, अस्तित्व है बचाना जरूरी,  जिंदगी के इस मंजर में, धीरज रखना है जरूरी ! कैसा भी रहा हो दौर, कब कहाँ है यह ठहरा? यह समय भी नहीं रहेगा, मानो अब ही गुजरा।

सावित्री- भाग -4 एक निर्णय सही या गलत

            घर के काम पूरे होने के बाद मैंने सोचा- सावित्री के हाल चाल ले लूं। जैसे ही उसके घर के पास पहुंची-उसके जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दे रही थी। वह किसी से फोन पर बात कर रही थी। मेरे पदचापों से उसने फोन काट दिया। सावित्री को देख कर मैं स्तब्ध रह गई। बाल बिखरे हुए, आंखें सूजी हुई, मानो बहुत रोई हो। जले हुए हाथ को ढक रखा था। घर की दीवारें साफ थी। कहीं कुकर फटने के निशान नहीं थे। मेरे दिमाग में कई प्रश्न कौंध गए। फिर भी हिम्मत करके पूछा- "सावित्री क्या हुआ? घनश्याम ठीक है ना!" " वो तूफान मचाए हे।" मेरे दिमाग में घनश्याम के प्रति एक पत्नीव्रता और सीधे-सादे पति की छवि बैठी हुई थी। वह भला कैसे तूफान मचा सकता है? कोने में रखे स्टूल पर मैं बैठ गई। सावित्री मेरे सामने बैठ गई। बोली-" भाभी, अब मन ना लगे है, टेम केसे निकलिहे। जिंदगी बोत भारी हे। कोई चाव ही ना बचा। गाड़ी ....रेंगरी...।" यह किस बात के लिए इतनी भूमिका बना रही है, मैं समझ नहीं पाई। "घनसाम हमार चाचा के मरे पे गया हे। चाची कई बरस पहले खतम भइ। चाचा की लईकी हमार भेंन अनाथ भइ। सादी लायक है। घ...

सावित्री- भाग-3 एक और दर्द।

            घनश्याम के तेज बुखार ने सावित्री में हलचल ला दी। डॉक्टरों के इर्द गिर्द घूमना, सेवा सुश्रुषा, शारीरिक पीड़ा-इन सभी दर्दों को वह भूली नहीं थी। रात घनश्याम के लिए काढ़ा बनाया, वह सो गया। सुबह मेरे पास आई, " भाभी, घनसाम को बुखार है। क्या करूं? डागदर के पास...।" वह अधूरे वाक्य के साथ चुप हो गई। मैं समझ गई-यह डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहती है। मैने किसी को भेज कर घनश्याम का बुखार नपवाया-100 ही था। एक गोली दे दी और काढ़ा भी देने को कह दिया। शाम तक घनश्याम का बुखार उतर गया। कमजोरी थी दो दिन आराम कर लिया। घनश्याम के बुखार ने सावित्री को सचेत कर दिया। निस्तेज बनी सावित्री में कुछ तेजी आई।              सावित्री मेरे पास आई, "भाभी, गांव जाइहें। बड़का सास ससुर है मिलिहैं।" ''कब तक आओगे?" "दस दिन तो लगिहैं!" दस दिन के लिए घनश्याम ने अपने किसी परिचित को ड्यूटी पर लगा दिया। 20 दिन....दोनों आ गए। अगले दिन सावित्री घर आई। मैंने पूछा- "चाय पिएगी?" " हाँ "कह कर वह बैठ गई। "तेरे सास ससुर कैसे हैं?" "ठीक"-सावित्री की ...

सावित्री -भाग-2 एक माँ की पीड़ा

            मैं सुंदर के लिए चिंतित थी। सावित्री के घर पहुंची, वहां की स्थिति देख कर स्तंभित रह गई। दोनों के बाल बिखरे हुए, मुँह सूखा हुआ, अस्त व्यस्त, मानो कई दिनों से नहाए नहीं, कुछ खाया नहीं और सोए नहीं। एहसास हो रहा था- दोनों के आँसू भरे हुए हैं, पर रुके हुए हैं। घनश्याम का भाई और उसकी पत्नी दोनों को ढांढस दिला रहे थे। सुंदर पलंग पर लेटा हुआ कराह रहा था। नाभि के नीचे दर्द बता रहा था। मैंने पूछा- " सावित्री, डॉक्टर को दिखाया?" " हाँ, भाभी, गए रहीं, डागदर दावा दिए।" "पर डॉक्टर ने क्या बताया ?" "पेसाब में इनफेक्सन।" घनश्याम का भाई बोला-" कल हम सभी घूमने गए थे, वहां बच्चे तालाब में उतर गए थे-पानी में खूब खेले। वहीं से इन्फेक्शन हो गया है।" सुंदर की तड़प देखकर  मुझे स्थिति चिंताजनक लगी। दो दिन सावित्री काम पर नहीं आई। तीसरे दिन मैंने अपने घर की बालकनी से देखा- घनश्याम सुंदर को गोद में ले कर ऑटो से उतर रहा है और सावित्री पेमेंट कर रही है।             थोड़ी देर बाद मैं सावित्री के पास गई। सावित्री के कहे अगनुसार पता चला-' दूसरे...

सावित्री

            बर्तनों की इतनी ज्यादा आवाज मुझे अच्छी नहीं लग रही थी। यह तो पता था-बर्तन माँजने के लिए सावित्री आ गई है। गिलास के गिरने की आवाज से मैं चौंक गई। बर्तनों में कांच के बर्तन भी हैं, टूट गए तो नुकसान तो होगा ही, कांच के टुकड़ों से किसी के घायल होने की आशंका भी बनी रहेगी। इससे पहले बर्तनों का इतना शोर कभी नहीं हुआ। सच कहूं तो सावित्री का सिर्फ घर में घुसना और काम करके बाहर जाना ही पता चलता था। अभी भी बर्तनों की आवाज आ ही रही थी। मैं उठकर रसोई में गई। मैंने पूछा-"सावित्री, तू ठीक है ना! कुछ परेशानी है क्या?" " हाँ, भाभी, मे ठीक हे, सॉरी।" सावित्री काम कर के चली गई।             सावित्री हमारी सोसायटी के चौकीदार घनश्याम की पत्नी है। ये गोरखपुर के रहवासी हैं। कई वर्षों से ये दोनों हमारी सोसायटी में रह रहे हैं। इससे पूर्व रवि चौकीदारी करता था। वह जवान था, हिंदी अच्छी बोल लेता था। एक दिन हमारे घर आया, बोला- "मैं कल यहाँ की नौकरी छोड़कर जा रहा हूँ। मेरी दूसरी जगह नौकरी लग गई है। बड़ी सोसायटी है, बड़ा शहर है, अच्छी तनख्वाह है। यहां ...

निस्तब्धता

आज सूना-सूना सा है यह शहर, भला क्यूं कर, वीरान है हर पहर। चहुँ ओर -छोर की यह निस्तब्धता, आभास कराती मन में पसरी व्याकुलता। मेरे आँगन के तरु हैं मुरझाए,  मंडरा रहे गहरे धुंधले साए। जुनून कहूँ या पागलपन इस खामोशी को, सुनता नहीं कोई किसी की बातों को। अमरबेल सी लिपटी है मेरी इच्छाएँ, राह है मुश्किल, कौन मन को समझाए। गहन कुहासे से है पथ-अवरुद्ध, चुनौतियां हैं अनगिनत, मैं हूँ निःशब्द।     नहीं रही संवेदना, मूंद गए नयन। मुँह में है राम, हाथ में है जाम। धर्म की आड़ में कत्ल हो रहा ईमान, स्तब्ध है सृष्टि, कब होगा विराम।

कोड वर्ड

            इन दिनों राजेन्द्र का बेटा नितिन अमेरिका से आया हुआ है, उसका परिवार अमेरिका में ही है-आया था 10 दिनों के लिए, पर लॉक डाउन की वजह से अब ज्यादा दिन रहना होगा। साथ रहते रहते नितिन ने अहसास किया- 'आज हमारे पास समय बिताने के कई जरिये हैं, पर बुजुर्ग माता-पिता को तो परेशानी होती! अच्छा हुआ, इस समय मैं इनके पास हूँ। आज इनके मनोरंजन के लिए कुछ करूँगा।'             नितिन ने समय तय करके बच्चों को मोबाइल हाथ में लेने को कहा और अपने पास मम्मी-पापा को बैठाया । राजेन्द्र और उनकी पत्नी विस्मय निगाहों से देख रहे हैं। नितिन बच्चों से कह रहा है- "मैं तुम्हें कोड नंबर दे रहा हूँ, तुम दोनों लूडो में जॉइन करो और दादा-दादी के साथ खेलो।" लूडो खेलने में एक दूसरे की गोटी कटने पर बच्चों का इमोजी भेजना-दोनों को रोमांचित कर रहा है। हर तीसरे दिन नितिन अपने परिवार और बहन के परिवार से ज़ूम पर वीडियो कर लिया करता। माता-पिता की खुशी का पूरा ध्यान रखता।             नितिन ने गौर किया-रोज सुबह पड़ोस के मिश्रा जी अपनी बालकनी...

बदलाव

            रागिनी अपनी बेटी राशि के साथ नदी के पानी के बीच खड़ी है। भाव विभोर हो कर बोली-" राशि, मैं हमेशा ट्रेन या बस से सफर करते समय नदी को निहारा करती थी, पर आज डुबकी लगाने का मौका मिला। आज तुम्हारे नानी,नानाजी का तर्पण करके मुझे आत्मसंतुष्टि मिल रही है। भीनी-भीनी ठंड में नदी की थाह का अनुभव मुझे रोमांचित कर रहा है। मैंने सोचा नहीं था-मैं यह सुख भी पा सकूँगी। बेटा, यह सब सम्भव हुआ तुम्हारे सहयोग से। किसी विचित्र बात है ना- नदी से मिलने के लिए मृत्यु ही जरिया बनी ! मैं पानी को देख रही हूं- इससे ज्यादा निर्मल कुछ नहीं हो सकता। इस नदी के पानी में कभी उफान भी आया होगा, तब यह क्रुध्द दिखी होगी ! अभी यह शांत और खामोश है।"             "माँ, इतने दिनों से तुम नदी पर ही आने की जिद क्यों कर रही थी ? यह तो घर पर भी हो सकता था।"             "हाँ बेटा, पर एक ऋणी पिता और ऋणी बन जाता। मैं इकलौती संतान हूँ। तुम्हारी नानी के जिंदा रहते जब भी वे दोनों मेरे पास आए , मेरे यहाँ खाने से बचते रहे । नानी के गुजरने के ब...

संस्कार

            सुलोचना अब बीमार रहने लगी है। उम्र ज्यादा नहीं हुई है, पर गठिया के दर्द से चेहरे पर थकान दिखने लगी है। रामकिशन सेवा निवृत्त हो चुके हैं। घर में बेटा, बहू, पोता, पोती से भरा पूरा परिवार है। सुबह मंदिर जाना और शाम को पार्क जाना - दोनों की दिनचर्या में शामिल है। घर से बाहर निकलो, तो हमउम्रों से, परिचितों से मुलाकात हो ही जाती है। मंदिर की पेढ़ी पर या पार्क की बेंच पर- बतियाने बैठें तो समय का पता ही नहीं चलता। वैसे भी अड़ोस-पड़ोस की खबरों में सुलोचना का मन बहुत लगता है।             आज काफी दिनों बाद मंदिर में देविका दिखाई दी। कुछ अस्वस्थ और परेशान लगी। सुलोचना ने पूजा की, परिक्रमा लगाई और बैठ गई-मंदिर की सीढ़ी पर। स्वाभाविक है- देविका के हाल चाल जानने हैं। मंदिर की सीधी पर बैठना देविका के भी नियम में है। बैठ गई सुलोचना के बगल में। "देविका, क्या बात है ? बहुत थकी लग रही हो? तबियत तो ठीक है ना! भाईसाहब कैसे हैं ?" "सब ठीक है। बस, काम का जोर ज्यादा रहा, सो थकान हो गई।" "क्यों बहू ना है घर में ?" "ना, बहू अलग हो गई। बेटे ...

जिंदगी का सफर

जिंदगी के सफर में हर लम्हे हैं अलबेले, मंजिल तक जाना ही होगा अकेले। पथ पथरीले, कंटीले रहे, पाए मैंने छदम, ठोकर खा गिर भी गई, बढ़ते रहे कदम। महफूज हो रास्ते, खुशियों भरा हो जीवन, इसी जद्दो-जहद में भटका यह मन । कभी रास्ता रहा सूना, तन्हा सफर रह गया, लगा, यकीनन मेरा कारवां ही बदल गया। नोट के मोह में मैं अटकी रह गई, कोल्हू के बैल सी फंसती चली गई। स्मार्ट फोन, कंप्यूटर के कशिश से नहीं बच पाई, जिंदगी की आपाधापी में जीना ही भूल गई। सफर में धूप है, तपना तो होगा ही, भीड़ बहुत है, रास्ता तो बनाना होगा ही। नई डगर पर नई मुश्किलें तो होंगीं ही, सफर है लम्बा, संभावनाएं बढ़ानी होंगीं ही। जरूरी नहीं, जिंदगी के सफर में हो रफ्तार, पर बना रहे संतुलन, हो यह एतबार। रहूँ स्वस्थ, यह करती रही सदा बंदगी, 'उस' मोड़ पर खत्म होने वाला,                          सफर है जिंदगी।