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Showing posts from November, 2019

पिता

            जया और रिया दो बेटियाँ हैं - मेरी। मैं बहुत गौरान्वित महसूस करती हूं कि दोनों बेटियां सुशील और गुणी हैं। हमारे दिए संस्कार विफल नहीं हुए। जया का विवाह हो गया। रिया की भी शिक्षा पूरी हो जाएगी। रोहन ने रिया के लिए वर देखना शुरू कर दिया है। ऐसा वर, जिसमें बेटी से ज्यादा काबिलियत हो। एक पिता की चाह है- लड़का सर्वगुणसम्पन्न हो। ऑफिस से आने के बाद घंटों कम्प्यूटर पर 'वर-तलाश-कार्यक्रम' जारी रहता, साथ ही फोनों का सिलसिला भी। मैं जानती हूं- रोहन बेटियों के प्रति हमेशा संवेदनशील रहे।             मुझे अपने स्कूल के दिन याद हो आए। मैं संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी। माँ और दादी को कह कर अपनी बात पापा तक पहुंचाती थी। अपनों से बड़ों के सामने पापा भी मुझे प्यार करने में संकोच किया करते थे। भावनाओं को अभिव्यक्त करने में पापा हिचकिचाते थे, बड़ों का लिहाज रखते थे, पर मन के भीतर अथाह प्रेम भरा होता था। वे अपने अहसासों को जज्ब किए रहते थे। कॉलेज में मैंने दाखिला लिया तो पापा मेरे लिए 'शक्तिस्तम्भ' रहे। बंदिशों भारी हिदायतें, रूखी सी हंसी औ...