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Showing posts from 2016

कोहरा

यह कैसा तिलिस्म - सा लगता है कोहरे में सब धुंधला ही लगता है | घनघोर कोहरा सोख रहा है रोशनी , सूरज भी तलाश रहा पृथ्वी अपनी | स्तब्ध -मौन है चहुँ ओर का शोर , तन्हाई भरी लम्बी रातों का भोर | नुक्कड़ - नुक्कड़  पे अलाव हैं सुलगते , चरम सुख मिलता है जब चाय हैं सुबड़ते | रोशनदान पर बैठा कबूतर रहा ठिठुर , गर्दन दबा , भूला गुटुर - गुटुर | रगड़ कर हम गर्मास दे रहे हथेलियों को , हथेली से ही ताप रहे चेहरे को | कल दिख रहा था मंदिर का झंडा , आज नहीं दिखा चौबारे का खम्भा | धुंध में राह पार करना नहीं होता आसान , एक-एक पग चलने पर हो जाता भान| जीवन में छाए कोहरे को भी मिटाना होगा , तन्हाई , अवसादों को दूर भगाना होगा | एक चाह- हर पल हो उल्लासों का मेला , जीवनं में नहीं रहे कोई अकेला |

मन के रंग

                                            हर 2 मिनट में मेरी निगाहें घड़ी पर पहुँच जाती , आज सुबह के 10 बज गए | स्मिता और संगीता दोनों बेटियाँ कॉलेज चली गई और श्रीमान दफ्तर चले गए , पर मीना का कोई अता-पता नहीं | रोज सुबह 9 बजे आ जाती थी - कहीं आशा बीमार तो नहीं हो गई | कल ऐसा लगा तो नहीं ! दरअसल मुझे मीना से ज्यादा आशा का इन्तजार होने लगा है | मीना - मेरे घर के भीतर के काम सँभालने वाली परिचारिका और आशा - उसकी चार वर्षीया बेटी | रोज मीना आशा के साथ सुबह 9 बजे आ जाती और शाम 4 बजे लौट जाती | इस बीच घर की साफ - सफाई , खाना बनाना ,घर के सारे काम संभल लेती और आशा मेरे इर्द - गिर्द ही घूमती रहती | 6 महीने हो गए  - इसकी मीठी बातें और हंसी से मेरा दिन का एकाकीपन भर - सा गया | इससे लगाव भी हो गया , इसलिए इन्तजार रहता है |                                              घ...

हमारी छुक-छुक रेल

                                                         गर्मी की छुट्टियों में बड़ा इंतजार रहता था - नानी के कब जायेंगे?  यह इन्तजार नानी के यहाँ जाने का इतना नहीं , जितना इन्तजार रहता था - ट्रेन में 24 घंटे का सफ़र तय करने का | पूरे रास्ते गुड़ की मीठी पूरी , नमकीन पूरी , अचार का स्वाद , कॉमिक्स पढने का मजा , आस - पड़ोस के यात्रियों से गपियाते , खिड़की से बाहर दृश्यों को ताकते --इन सब का अलग ही आनंद था | उस समय सफर में इत्मीनान था , सुकून था, पर अब वो कहाँ ?                                                           पिछले माह हुई रेल - दुर्घटना ने तो हमें डरा ही दिया | ट्रेन में गड़बड़ी का अंदेशा लोको - पायलट द्वारा देने पर भी अनदेखा कर दिया गया | सोचो तो ड्राइवर के कहने पर ट्रेन को रोक लेते -सभी यात्...

परवरिश

                                                  हरिप्रसाद बहुत खुश हैं | बिटिया आरती की सगाई रामस्वरूप के बेटे राजीव के साथ हो गई | उनके दोस्त रामस्वरुप ने अपना वचन निभाया | कुछ ही वर्ष पूर्व ही रामस्वरूप ने कह दिया था  ' आरती को तो मेरे घर ही ले जाऊँगा |'                                                   आरती 5 वर्ष की थी , जब पत्नी का देहांत हो गया | आस पास ऐसा कोई रिश्तेदार नहीं था , जिस पर विश्वास करके हरिप्रसाद आरती को उन्हें सौंप पाते , लिहाजा परवरिश की पूरी जिम्मेदारी अपने ही हाथों में रखी | वे ही माँ थे और वे ही पिता भी | उनका हर दिन बिटिया को चुम्बन दे कर उठाने से शुरू होता और रात उसे थपथपाकर सुलाने से बीतता | सच मानो तो वे आरती के लिए ही जी रहे थे | घर के अन्दर आरती और घर के बाहर नौकरी - दोनों के बीच सामंजस्य बिठाए रखते थ...

डब्बा गोल

                                                   कल अखबार के मुखपृष्ठ पर लिखा था- सीनियर सिटीजन किसी भी बैंक में जा कर अपने पुराने नोटों के एवज में नए नोट ले सकते हैं - पढ़ कर प्रसन्नता हुई | हम दोनों 1000 के 4 नोट लेकर बैंक पहुंचे - क्योंकि नोट बदलवाने की सीमा मात्र 2000 प्रति व्यक्ति ही थी | बैंक में पहुँच कर पता चला - ' डब्बा गोल 'अर्थात् बैंक में कैश ही नहीं है | काम पूरा न होने का अफसोस रहा और हम बैंक से बाहर आ गए | हम सड़क पार कर ही रहे थे - तो एक युवक ने हमें रोका - " आपको नोट बदलवाने हैं क्या ? " हमने गर्दन हिला कर स्वीकृति दी , तो युवक ने अपनी जेब से 100 रुपये के कुछ नोट निकाल कर कहा - " ये 8 नोट हैं , आप इस के बदले मुझे 1000 रुपये का पुराना नोट दे दो | " हम मूक बने , उसे अनदेखा कर आगे बढ़ गए |                                             ...

मैं समय हूँ

मैं समय हूँ , सृष्टि के बराबर उम्र मेरी , सदा रही, सदा रहेगी , हुकूमत मेरी | पल , दिन , साल मेरा बोध कराती , भागता हूँ , पर पदों की आवाज नहीं आती | मुट्ठी में रेत को न रोक सकोगे , भला मुझे कैसे टोक सकोगे | मेरी निरंतरता , शाश्वतता को पहचानो , मेरे निष्पक्ष व्यवहार को जानो | गुजरा वक्त याद ही बन जाता है , आता वक्त एक ख्वाब ही होता है | वर्तमान ही बस मैं ' समय ' हूँ , ' आज ' ही मैं ' कालजयी ' हूँ | हर युग के इतिहास का साक्षी हूँ , सोने - चाँदी के सिक्कों का गवाह हूँ | पाइ , आना ,चवन्नी , को जाते देखा , तो २००० के नोटों को आते भी देखा | मैंने पनघट में पानी की गगरी भरते देखा , नल से भी पानी को टपकते देखा | अब बोतल में पानी को बिकते देख रहा हूँ , इस अमृत का निरादर देख उदास हूँ | जब गलती इन्सान कर जाता है , वह इल्जाम मुझे दे जाता है | कटघरे में खुद को खड़ा पाता हूँ , और वह बरी हो जाता है | पीड़ा के झंझावत में मुझे न फंसाओ , समय के साथ खुद ही बदल जाओ | तकाजा है वक्त का तूफां से जूझो , कहाँ तक चलोगे किनारे -किनारे ....बूझो |

पूत कपूत से तो बाँझ भली !

                                          कुछ दिन पूर्व एक वृद्धाश्रम के सामने से गुजरना हुआ | द्वार के पास काफी भीड़ दिखी - अनायास पैर अन्दर की और खींचे चले गए | इस से पूर्व आश्रम में दो बार चुकी हूँ | पर हमेशा तरह की नीरवता और शांति ही मिली | आज भीड़ को देख कर उत्सुकता हुई | पूछने पर पता चला - ' कौशल्या जी का देहांत हो गया | ' काफी वर्ष पूर्व कौशल्या जी के बेटे उन्हें इस आश्रम में छोड़ गए थे | इनके दो बेटे और एक बेटी हैं |                                            मैंने एक परिचित स्थानीय कर्मचारी से पूछा - " इनके बच्चे कब आएंगे ? " उन्होंने कहा - " जी कहाँ ? उनका कोई अता पता ही नहीं | जब तक पिता की पेंशन बच्चों को मिलती थी , तब तक हर माह कोई ना कोई बच्चा आता था , पर जब से हमने पेंशन कौशल्या जी को दिलानी आरम्भ की , तब से उनमें से कोई आया ही नहीं | उन्होंने जो पता लिखाया - व...

आओ, इस बार नया कुछ कर लेते हैं

नहीं चाहती दीपों में एक दीप जलाऊं , चाह यही, गहन तिमिर में एक दीप जलाऊं | हर वर्ष हम रस्म - गुजारा कर लेते हैं | आओ , इस बार नया कुछ कर लेते हैं | शहीदों के परिवार में है नैराश्य का अंधकार , सूना है हर पर्व , हर पल उनमें है मायूसी के उद्गार | आओ , शहीदों की शहादत को स्मरण करें , एक दीप जला , संग पर्व मना ,नमन करें , नमन करें | माई की झुग्गी में है घनघोर अँधेरा , आओ, दीप जला , झुग्गी में कर दे उजेरा | रामू रोशनी बिना न हो सका शिक्षित , एक दीप जला , उसका जीवन कर दे प्रमुदित | सौहार्द और प्रेम की छटा सदा बनी रहे , एक दीया माटी का वृत्तिका संग हुंकार भरे | जात-पात का भेद , द्वेष - भाव का हो विसर्जन , सच मानो तो यही दिवाली है 

मेहनत- किस के लिए ?

                                                      प्रकाश की आलीशान कोठी - आधुनिक साज सज्जाओं से सुसज्जित - अपनी भव्यता का परिचय दे रही है | घर के बाहर लॉन में मखमली घास , गैरेज में खड़ी गाड़ियाँ सम्पदा के प्रतिक हैं | घर बड़ा है , पर घर में रहने वाले महज चार सदस्य - प्रकाश ,पत्नी श्यामा और दो बेटे | यह कोठी पुश्तैनी नहीं है , बल्कि प्रकाश ने अपनी कमाई से ही इस कोठी को ख़रीदा है | इससे पूर्व यह परिवार दो बेडरूम -रसोई के फ्लैट में रह रहा था | प्रकाश ने एक दुकान से अपना व्यवसाय प्रारंभ किया था | काम धंधा अच्छा चला | दुकान ने बड़ी कंपनी का और फ्लैट ने कोठी का रूप ले लिया | श्यामा एक साधारण गृहिणी है | पहले तो बच्चों के लालन पालन में व्यस्त रही | पर अब फुरसत होने पर भी , साधन और सुख-समृद्धि बढ़ने पर भी इसमें कोई ज्यादा अंतर नहीं आया | नौकर- चाकरों से काम लेना , महंगे कपडे पहन कर महंगे कालीन पर चलने की शालीनता - ये अदब जरुर स्वाभाव में आ गए | हाँ , प्रकाश की जी...

करवा चौथ का चाँद

भारतीय स्त्रियों के सुहाग का त्यौहार | साज - श्रृंगार  का यह त्यौहार | दिन ढले , अँधेरी रात में चाँद के इंतज़ार का यह त्यौहार | सुहाग पर्व पर जब चाँद आसमान में आता है , तो अपने इन्तजार में असंख्य नैनों को बेकरार पाता है | हर सुहागन के करवे से निकली जलधाराओं में मन्नतों का अटूट सिलसिला होता है , विश्वास होता है | इस रात चाँद दीवारें पार करके छत पर निकाल लाता है - रिश्तों को | सबको जोड़ना - जुड़ना सीखा जाता है - करवा चौथ का चाँद | युगल प्रेम बढ़ा जाता है - करवा चौथ का चाँद |

कागज़ के रावण

गत दशहरे पर - जब रावण को जलते देखा, तो मिट गई शंका की रेखा | अब कोई रावण नहीं बचा है , लो , फिर एक रावण तैयार खड़ा है | कागज़ की रावण हम जला रहे ,  पर जिन्दा रावण तो हैं घूम रहे | अन्याय , अधर्म , अहंकार , ये सब ही तो  हैं रावण के परिवार | पग - पग पर दम्भ भरते मेघनाद , जो सदा दे रहे रावण का साथ | मूँदे आँखे हम हैं मौन , कुम्भकरण हम नहीं तो कौन !

वरद हस्त रख दो माँ

                                                 हम भारतीयों की धार्मिक प्रवृत्ति बहुत सुयोजित है | हम मंदिर या देवालय जाते हैं | पादुकाओं को  दरवाजे पर छोड़ चौखट पर मस्तक टिकाकर देवता के सामने हाथ जोड़ कर बैठ जाते हैं | हम बिना कुछ कहे - निःशब्द रह कर प्रभु के सामने अपने मन का दामन फैला देते हैं | दोनों हथेलियों को एक दूसरे पर रख कर चरणामृत को लेते हैं , जमीन पर बूंद गिरने से बचाने के लिए सिर पर हाथ फेरते हैं | इन सब के बीच सभी को यह विश्वास तो है ही कि यहाँ बोलना जरुरी नहीं ! कुछ तो है जिस की मौजूदगी हमें यकीन दिलाती रहती है | मंदिर के द्वारा ही एक सच का शिद्दत से यकीन हो जाता है कि इस कायनात के सभी लोग ' सुख की चाह ' रूपी धागे से जुड़े हैं |                                                    हिन्दुस्तानी तहजीब में आस्था के अलग-अल...

बाबूजी ---गतांक से आगे

                                                                  अगले सप्ताह बाबूजी का फ़ोन आया- ' मैं रविवार को मुंबई पहुँच रहा हूँ | ' रविवार सुबह बाबूजी आ गए | घर में काफी रौनक हो गई | पूरा दिन बाबूजी अपना सामान अपने कमरे में व्यवस्थित करने में लगे रहे | मदद के लिए बार-बार सुनील को बुलाते | रात खाना खाते वक्त सीमा बोली- " बाबूजी , मैं सुबह दस बजे दफ्तर जाती हूँ और शाम पांच बजे लौट आती हूँ | " बाबूजी समझ गए , बोले- " बेटा , मैं सुबह चाय नाश्ता तुम लोगों के साथ करूँगा , मेरे लिए खाना बना कर रख जाना - मैं दोपहर में खा लूँगा | शाम की चाय तुम्हारे साथ पीऊंगा | "                                                                   सोमवार- घड़ी की वही भागती सुइयाँ और अ...

बाबूजी

                                               सीमा ने ऑफिस से आकर घर का ताला खोला , अन्दर एक लिफाफा पड़ा मिला | अरे , यह तो बाबूजी का पत्र है | ऊपर पते पर सीमा - सुनिल दोनों के ही नाम लिखे हैं | उनके हर पत्र पर दोनों का ही नाम लिखा होता है , जिससे पत्र व्यक्तिगत न लगे | पत्र खोला , लिखा था - ' मैं नौकरी से एक वर्ष पूर्व ही सेवानिवृत्ति ले रहा हूँ और तुम दोनों के साथ रहना चाहता हूँ | पहुँचने की तारीख तय होते ही सूचित करूँगा | '                                                  सीमा को बीते दिनों की याद हो आई | दो वर्ष पूर्व सीमा मुंबई के इस घर में ब्याह कर आई थी | तब माँ - बाबूजी यहीं साथ में रहते थे | पर छः महीने बाद बाबूजी का ट्रांसफर नागपुर हो गया | इन छः महीनों में सीमा ने गौर किया था कि बाबूजी को घर के किसी काम में मदद करने की आदत नहीं थी या...

कौन जाने , कब ये ठहरे !

बंधे हाथों पर टिकी है ठोढ़ी, मुग्ध हूँ , ख्यालों में थोड़ी-थोड़ी | मन अस्थिर है पर विचलित नहीं , खोने का कोई अवसाद नहीं| स्मृति की मंजूषा में मोती अनेक, अनमोल हैं , तराशे गए नेक | उपकार प्रभु का , मानव जीवन पाया , जीवन में है बहुत कुछ पाया | क्या कहूँ , शब्दों ने नहीं सीखा , मानो गूंगे के लिए गुड़ सरीखा उंगली पकड़ जिन्हें चलना सिखाया , आज मेरे बच्चों ने ही हौसला बढ़ाया | आज उम्र मेरी साठ हो गई , लो , मैं बड़ी ,बहुत बड़ी हो गई | सुर्ख काया कुछ मटैली हो गई , चनचनाती धूप कुछ मद्धिम हो गई पर उमगती है उमंगों की लहरें , कौन जाने , कब ये ठहरे !\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\ हर स्पंदन पर बढ़ती एक चाहत , कुछ देर बैठ , लूँ अब राहत | रिश्तों की उधड़ी बखिया सी लूँ , अपनी अधूरी इच्छाओं को फिर जी लूँ ! नहीं कभी कोई इच्छा महान बनूँ ,  बस फर्ज निभा एक इंसान बनूँ |

एक माँ की सीख

                                                                                             " बच्चे स्कूल से आ गए क्या ?"  कमरे में से सुशीला ने आवाज दी | सास की आवाज से रमा की तन्द्रा भंग हुई | रमा डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठी है | बोली- " हाँ , माँ जी , बच्चे आ गए हैं | कपड़े बदल रहे हैं | आप आइये | खाना परोस रही हूँ | " सुशीला प्रायः अपने बड़े बेटे के पास रहती हैं | इन दिनों रमा सुरेश के पास आई हुई हैं | सुशीला ने घर में एक नियम बना दिया है कि यहाँ उनके रहते घर में उपस्थित सभी सदस्य एक साथ बैठ कर ही खाना खाएं | बच्चे जया और जतिन कुर्सी पर बैठ गए | रमा ने खाना परोसा -दाल  और भरवां भिन्डी , रोटी | जतिन को दोनों ही चीजें पसंद नहीं | थाली परोसते ही बिदक गया और जोर से थाली को धक्का दे कर चिल्लाया - " मम्मी , मैंने आपसे कितनी बार कहा है मुझे ये स...

घर पधारो गजानंद

एक व्यक्ति गरीबी से त्रस्त था | किसी ने सुझाव दिया - ' गणेश जी की पूजा कर , प्रथम आराध्य देव हैं | तेरी सभी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी | ' वह अगले ही दिन गणेश जी की मूर्ति ले आया और घर में स्थापित कर ली | रोज स्त्रोतों  का पाठ करता | घंटे-घड़ियाल बजाता | पूजा -अर्चना में कोई कमी नहीं रखी | दो वर्ष  बीत गए , परन्तु आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया | एक दिन उसने गुस्से में गणेश जी की मूर्ति को हटा कर लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित कर दी | गणेश जी से तो नाराज था ही | अगरबत्ती का धुआं , घंटो की आवाज गणेश जी तक न पहुंचे इसलिए रुई की गोलियाँ गणेश जी कान - नाक में लगा दी | इस तरह उसकी नाराजगी साफ जाहिर हो रही थी |  थोड़ी ही देर में गणेश जी की मूर्ति हँसने लगी | अब तो वह घबरा गया | विस्मय दृष्टी से गणेश जी को देखने लगा | गणेश जी बोले -" जब तक तू हमें जड़ मानता रहा , तब तक हम भी जड़ भगवान् थे | पर आज तूने मुझ में चेतना की अभिव्यक्ति करा दी , तू मुझे तुझ से मिलने आना ही पड़ा | गणपति बाप्पा मोरिया |

प्रकृति का उपहार

                            वर्षा थमे बीते दिन चार ,                             भीगी -भीगी सी है दिवार |                             टंगी हुई अम्मा-बाबा की तस्वीर ,                             सील गई ,हुए कागज़ तार-तार |                             दिखाया एक खेल कुदरत ने,                             पिछवाड़े के मैदान में |                             खरपतवार ने फैलाया जाल,                             निर्जन भू ने ओढ़ी हरी शॉल | ...

सूनापन

                                               रमा के पड़ोसी शर्मा जी के 3 बेटे हैं | शर्मा दम्पत्ति को हमेशा गुमान रहा कि उनके 3 बेटे हैं , कोई बेटी नहीं | बेटे बड़े हो गए हैं | कोई कॉलेज में पढ़ रहा है तो कोई कोचिंग में जाता है | श्रीमती शर्मा पूरे दिन घर को व्यवस्थित करने और बेटों के फैले कामों को बटोरने में लगी रहती हैं | इनके घर में पुरुष-बहुलता होने के कारण सभी के विचारों में अहम् टपकता ही है | व्यावहारिकता में भी ये लड़के स्त्रियों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं क्योंकि इन्होंने ' बहन ' के रिश्तों को कभी जाना ही नहीं !                                                 आज रक्षाबंधन है - राजस्थानी परिवार होने के कारण रमा के यहाँ इस त्यौहार को अलग अंदाज से मनाया जाता है | हॉल में दोनों भाई , दोनों भाभी , दोनों भतीजियाँ - रीना और टीना एवं दोनों भतीजे -रा...

गोसेवा का दिखावा

                                          बचपन से ही घर में सुनती और देखती आई हूँ- चूल्हा जले तो पहली रोटी गाय की हो | दादी  कहती थी -'गाय में सभी देवताओं का वास होता है |' आज भी दादी के दिए संस्कार हमारी आदत में निहित है  | गाय को देवता के रूप में मानना -सभी इस बात के पक्षधर नहीं हैं | हाँ , गोहत्या न हो -यह तो सभी मानते हैं |                                            पिछले दिनों दादरी में कुछ शरारती तत्वों ने मोहम्मद अख़लाक़ के घर में गोमांस की अफवाह फैलाई और इस शक में उसे पीट-पीट कर मार डाला | हिन्दू- मुसलमान या जातीय- विवाद के लिए ' गाय ' को मोहरा बनाया जा रहा है | राजनैतिक दांवपेंच खेले जा रहे हैं | यह एक संवेदनशील विषय है |                                       ...

फिर घिर आए बदरा

फिर घिर आए बदरा , चहुँ ओर छाया अंधियारा | नभ में बिछी एक काली चादर , सूरज को है ओट छिपाए | तपती धरती ,खुश्क हवा , टप-टप, टप-टप बरसा पानी | लो बरसन लागी बदरिया झूम के 

करे कौन , भरे कौन !

                                   आज अखबार में पढ़ा - मन बहुत विचलित और आक्रोशित हुआ | स्कूल की बस का ड्राइवर इअरफोन पर गाना सुनते हुए बस चला रहा था |  मानव रहित क्रोसिंग पर से बस को ले जाते वक्त आती हुई ट्रेन को देख कर भी जल्दबाजी में पटरी पार करने की कोशश की | आश्चर्य की बात यह कि पटरी के पास गुजर रहे एक कर्मचारी के चिल्लाने पर भी ड्राईवर ने बस नहीं रोकी  | खुली आँखों से अनहोनी जान कर भी  उसने अपनी और बच्चों की जान दांव पर लगा दी , भला इयरफोन लगे बंद कानों से उस कर्मचारी की आवाज कैसे सुन पाता ! बस , बहुत बड़ा हादसा हो गया  | सभी असमय काल के आगोश में आ गए | दर्दनीय स्थिति उन अभिभावकों की हो गई , जिन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए एक सुरक्षित हाथ चुना था | एक लापरवाही से या यूँ कहे जानबूझ कर की गई गलती से कई घर के आँगन सूने हो गए |                                      इयरफोन...

" टैक्सी से चालंगा "

                                             बात काफी वर्षों पुरानी है , पर याद मानो आज भी ताजा है | मोदानीजी के चार भाईयों के परिवार में बेटियाँ ब्याह लायक हो चुकी थी | लोकनाथ जी सबसे बड़े थे | सादगी एवं सज्जनता के वे प्रतिमूर्ति थे | लोकनाथ जी  की बहन सुशीला जी उनके साथ ही रहती थी | बेटियों की शादी की चिंता लोकनाथ जी से ज्यादा उनकी बहन को थी -या यूँ कहो बहन के चिंता करने के कारण लोकनाथ जी कुछ बेफिक्र थे |                                                                                          सुशीला जी एक स्कूल में अध्यापिका थी | प्रायः उस स्कूल में एक ब्राह्मणी कमला कई बच्चों को छोड़ने आया करती | शायद अपने मोहल्ले के सभी छोटे बच्चों को एक साथ स...
                                                      मैं ' उमा ' ख्वाबों की दुनिया में मैं , पहचाने राहों पर अनजान न जाने कहाँ खो गई | विस्मृत यादों में धुंधली - सी परछाई अपनी पाई | तीन बहनों में मैं मझली , पापा ने नाम दिया  ' उर्मिला ', दादी ने किया एतराज, '' नाम है बड़ा | पुकारूंगी , तब तक भाग जायेगी | ' उमा ' नाम है छोटा ,  कहते ही पास पाऊँगी |" मेरी दादी थी मॉडर्न , डेढ़ अक्षर कम कर के मुझे दिया निकनेम |

अपनों के खोने का भय

                                                   आज घर में चारों तरफ शोर हो रहा है | माहौल बहुत खुशनुमा है | हो भी क्यों ना ! आज अम्मा अस्पताल से आ रही हैं | गत माह अम्मा को पीलिया हो गया था | भैय्या की शादी थी- बस बदपरहेजी हो गई और पीलिया बिगड़ गया | शादी के तुरंत बाद ही अम्मा को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा | पूरे  एक माह बाद अम्मा का घर आना सभी को अच्छा लग रहा है |                                                    मुझे अच्छी तरह याद है | एक दिन मेरी सहेली स्मिता की देखादेख मैंने अम्मा को ' दादी ' कह कर पुकार लिया | उन्होंने अनसुना कर दिया | मैं उनके पास गई और पल्ला पकड़ कर बोली -"मैं आप ही को पुकार रही थी |" वे बोली- "पर मैं तो दादी नहीं ,अम्मा हूँ |" वे हमारी ही नहीं ,मोहल्ले की अम्मा हैं -'जगत-अम्मा' हैं, उनके अम्मापन मे...

बरसा पानी

रिमझिम बरसा पानी भीगा जयपुर , भीगे हम | मानसून ने दी दस्तक , आई राहत की मुस्कान ' ए बरखा राणी , माटी होगी गीली , इब आंधी को कोनी डर , ओजू , पधारो म्हारे देस , दो-चार दिन म्हारे संग रह्जो |'

तपता सूरज

      पौराणिक कथाओं में पढ़ा था -       हनुमान ने पाया अमर-जीवन ,       कहीं राह चलते ,       आज मिल जाए हनुमान ,       मैं हाथ जोड़ खड़ी हूँ-       'आज हो जाओ प्रकट ,       दोहरा दो पुनः वह शैतानी ,       कुछ पल निगल जाओ सूरज को ,       नहीं है मेरा कोई स्वार्थ ,       होगा सर्वजन हिताय |

गर्मी ! उफ्फ्फ गर्मी !

        जल बिन यह सूनापन ,         मुरझाती फसलें , मुरझाते चेहरे ,         आलू , प्याज , टमाटर के बढ़ते दाम,          थाली के घटते स्वाद ,          दूभर हुआ खान पान | *          *          *          *          *           राजस्थान में है मोरों का वास ,           खामोश नभ को देख ,           मोर का भी बदला सुर,           ' मेह आओ , मेह आओ ',           करुण- क्रंदन छूता दिल को |

ये तपन

       चिंटू की हड्डियाँ हैं कमजोर ,        गए चिकित्सक के पास ,        बोले -'विटामिन डी की है जरुरत ',        दिया सुझाव-' आधा घंटे लें ,        उगते सूरज की आंच' ,        पर हुआ यह नामुमकिन ,        उगता सूरज ही है बड़ा क्रोधित ,        बरसा रहा दावानल ,        सह न सका चिंटू ,        विटामिन डी की आंच |    

गर्मी ! गर्मी ! गर्मी !

         ये भीषण गर्मी ,          दिनोंदिन बढ़ती तपन ,          आग बरसाती ये सूरज की किरणें ,           पसीने से सराबोर इंसान ,           हर पल घूरता नभ को ,           कब बरसेगा पानी |

पुण्य की परिभाषा -16जून -निर्जला एकादशी के उपलक्ष्य पर

                                               जेठ महीने की तपती दोपहर | बिजली का बिल भर  कर अंकित लौटा ही था | घर के बाहर के लॉन को पार करके घर में प्रवेश कर ही रहा था कि बगिया में काम करते हुए माली ने कहा -" बेटा, बहुत प्यास लगी है , मेरी बोतल में तनिक ठंडा पानी भरवा दो |" अंकित ने ज्यादा विचार न करते हुए माली के हाथ से बोतल ली और घर के अन्दर आ गया | माली चिल्लाता रहा -"बेटा , सुनो तो !"  पर अंकित घर में प्रवेश कर चुका था |                                                  अंकित ने आवाज दे कर कहा -" माँ , माली काका की बोतल में ठंडा पानी भर दो और मुझे भी पानी पीना है | माँ , बाहर तो आग ही बरस रही है |" कमरे में सोफे पर बैठी  दादी ने देखा भी और सुना भी | जोर से चिल्ला पड़ी -" अरे तो तू उसकी बोतल ही क्यों उठा लाया ? इसे परे को रखिये...

चौराहे पर --------1978 में लिखित

      उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,       निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक       बजे थे छः उदित सुबह के ,       जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |       दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,       बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |       स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,       हुई यह छोटी सी गलती उससे      'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,      करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |      अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,      भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |      उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,      पर करा नीचे कुछ सोचकर |     चले गए वे यह बड़बड़ाकर -     'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|                                   मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,             ...

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

कहीं पढ़ी, अच्छी लगी |

* गैर को अपना बनाने की अदा जाती रही ,    दिल की महफिल को सजाने की अदा जाती रही |    कीमती कालीन जब से मेरे घर में आ गए ,    बेहिचक घर आने जाने की अदा  जाती रही |    बाथरूमों  की नई कल्चर में ऐसा बंद हूँ ,    खुल के बारिश में नहाने की अदा जाती रही |    वक्त ने कुछ ऐसे छीने प्यार के लम्हे ,    रूठने की और मनाने की अदा जाती रही | * एक ही गलती , सारी उम्र करते रहे ,    धूल चेहरे पे थी , हम आइना साफ करते रहे | * सब चाहते हैं मंजिलें पाना चले बगैर , जन्नत भी सभी को चाहिए मरे बगैर | * हर शख्श दौड़ता है यहाँ भीड़ की तरफ , फिर ये भी चाहता है , उसे रास्ता मिले |

एक अनुभव

                                                        मेरे घर एक परिचिता आई -काफी अस्वस्थ थी | कुछ दिन पूर्व उन्होंने एक नामी अस्पताल में घुटनों का ऑपरेशन कराया था | अब पुनः चेक अप के लिए वे उस अस्पताल जाना चाहती थी | मदद के तौर पर उन्होंने मुझे साथ चलने का अनुरोध किया | हम दोनों अस्पताल पहुंचे | ऑपरेशन डॉक्टर अवस्थी ने किया था | हमने रिसेप्शन पर बैठी महिला से पता कर लिया कि डॉक्टर अवस्थी  अस्पताल में आये हैं और थोड़ी देर में अपने केबिन में पहुँच जायेंगे | ५०० रुपये भर कर परचा बनवा लिया | हमारी तरह काफी मरीज डॉक्टर अवस्थी को दिखाने कतार में बैठे थे |                                                         2 घंटे की प्रतिक्षा के बाद भी डॉक्टर अवस्थी अपने केबिन में नहीं आये | कुछ मरीज बैचेन होने लगे -रिसेप...

अभिवादन - एक भारतीय परम्परा

                                              आज भागती जिन्दगी अर्थात् FAST LIFE में 'हाय ' 'हैलो 'कहने  की प्रथा  है ' नमस्ते' अब कौन कहता है , करता है ! गर्दन को थोडा झुकाकर हाथों को जोड़कर नमस्ते करना - एक पुरानी सी बात हो गई है | अभिवादन का तात्पर्य है- GREETING . यदि हम 'हैलो'  कह कर भी किसी का अभिवादन करते हैं  तो सामने वाले इंसान को उसकी अहमियत का अहसास होता है |                                                                                                                  हम राह चलते हर व्यक्ति को तो नमस्ते करते नहीं या हैलो कहते नहीं ! आपने गौर किया होगा-यदि हम किस...

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...

ओम जय जगदीश हरे

ओम जय जगदीश हरे , ओम जय जगदीश हरे , प्रभु , तेरे द्वार रत्न भण्डार , तेरे घर बड़े हरे -भरे | पद्मनाभ हो या वैष्णो देवी या हो तिरुपति , शिरडी हो या सिद्धी विनायक गणपति | तहखानों में बरसती सम्पदा रिमझिम-रिमझिम , खुल जा सिम सिम , खुल जा सिम सिम | प्रभु जग ने जाना भारत है सोने की चिड़िया , जानो , बूझो कितनी चमकीली, विराट है चिड़िया ! इस सोने की चिड़िया से क्या होगा देश का भला ? क्या धन सम्पदा जरुरतमंदो को रहेगा फला ? प्रभु , तूने बहुत कुछ दिया , तेरा तुझको अर्पण , पर जब तुझसे न संभले , कर मुझ को ही अर्पण | जो प्रसाद चढ़ाते , मिल-जुट-बाँट खा लेते , कोई ऐसी राह बना , चढ़ावा न चढ़ जाये स्विस के खाते| प्रभु , हर रूप में है तू नारायण , हाथ जोड़ खड़े हम दरिद्र- नारायण | प्रभु , तू है पूर्ण , नहीं चाहिए तुझे कुछ , आशीष बनाए रखना , हम पा  जाए बहुत कुछ | ओम जय जगदीश हरे , ओम जय जगदीश हरे |

कँवर साब सासरे जार फँस गा

रिश्तों हाल पक्को ही हुयो थो | कच्चा रिश्ता में जवाई जी सासरे गया | खातिरदारी तो होणी ही थी | घरां कोई  मोट्यार कोनी थो  | | सासूजी खूब आवभगत की | खाने को टेम थो - आसन बिछा दी , पाटे पर थाली रखी और खानो परोस दियो | जवाई  जी खानो खाने बैठगा | थाली में सब्जी, कढी, दही-बड़ा , चूरमो घणी चीजां थी | सासूजी  कने ही बैठगी- पंखों झेला लागी | जवाई जी ने कढ़ी कोनी भाती | सोच्यो पहले एने ही ख़तम कर दा और पी गो | सासूजी भोत राजी हुई ,सोची - ' कँवर जी ने कढ़ी भोत स्वाद लागी ,इलिए कटोरी रीति कर दी |' बा ओजू कढ़ी परोस दी | कँवर जी घबरा गा - तुरंत कटोरी मुंडे से लगाईं  और रीति कर दी | सासूजी भोत  राजी , फेर कटोरी भर दी | जवाई जी परेशान - फेर कढ़ी पी ली | पंखो हिलाता - हिलाता सासूजी  बोली -'' कँवर जी थे कित्ता भाई हो ? '' कँवर जी चक्कर तो खा ही रया था , परेशान हो कर बोल्या - ''जी , इब तक तो चार हां, पर इब थे कढ़ी परोस दोगा तो तीन ही रह जावेगा  !''

गिरगिट

                                        आप सभी जानते हो -'गिरगिट '| गिरगिट  रंग बदलता है | प्रायः अपने विचार बदलने वालों को गिरगिट की श्रेणी में रख कर लोग व्यंग कसते हैं | पर ऐसा क्यों ? क्या विचारों को बदलना  बुद्धि की अस्थिरता और नासमझी है?| मैं तो ऐसा नहीं मानती !                                         हमारी जिन्दगी पानी के प्रवाह की तरह गतिमान है- इसे किस-किस परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इस पर कितने ही प्रभाव हावी हो जाते हैं | आज का लिया हुआ निर्णय शायद कल बदलना पड़े ! शायद सन्मुख खड़े तकाजे इन्हें मोड़ दे | गिरगिट को ही देख ले - वह अपने बचाव के लिए या भावों को व्यक्त करने के लिए रंग बदलता है |  जड़ बने रहना परिस्थिति के अनुकूल न ढलना - अपरिपक्वता होगी | समय के अनुसार अपनी चाल बदलें- सीधे चलते हो तो टेढ़े भी चल कर देखें -यही विद्वता की निशानी है |       ...

परछाई

राह में चलते , अपनी ही परछाई देख मैं मुस्कराई, एक नुक्कड़ से दुसरे नुक्कड़ तक, मेरा आकार वही , कद वही , पर मेरा प्रतिबिम्ब , बदलता , सरकता , नाचता | पढ़ा था , सुना था - कभी -कभी  अपने साये से भी लगता है डर | नहीं , मैं डरी नहीं , मैं खुश हूँ- एक स्थिर आकृति अस्थिर प्रतिबिम्ब को देख | सहसा मैं कांप उठी , मेरी ही छाया अदृश्य हो गई , मैं तो यहीं हूँ  , भला  ' वो ' कहाँ गई ? उसे खोजने नज़र दौड़ाई , पीछे मुड़कर देखा- एक विशाल आदमकद व्यक्ति की विशाल छाया में , मेरी ही परछाई खो गई, पल भर में मैं बौनी हो गई |