यह कैसा तिलिस्म - सा लगता है कोहरे में सब धुंधला ही लगता है | घनघोर कोहरा सोख रहा है रोशनी , सूरज भी तलाश रहा पृथ्वी अपनी | स्तब्ध -मौन है चहुँ ओर का शोर , तन्हाई भरी लम्बी रातों का भोर | नुक्कड़ - नुक्कड़ पे अलाव हैं सुलगते , चरम सुख मिलता है जब चाय हैं सुबड़ते | रोशनदान पर बैठा कबूतर रहा ठिठुर , गर्दन दबा , भूला गुटुर - गुटुर | रगड़ कर हम गर्मास दे रहे हथेलियों को , हथेली से ही ताप रहे चेहरे को | कल दिख रहा था मंदिर का झंडा , आज नहीं दिखा चौबारे का खम्भा | धुंध में राह पार करना नहीं होता आसान , एक-एक पग चलने पर हो जाता भान| जीवन में छाए कोहरे को भी मिटाना होगा , तन्हाई , अवसादों को दूर भगाना होगा | एक चाह- हर पल हो उल्लासों का मेला , जीवनं में नहीं रहे कोई अकेला |
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !