रागिनी अपनी बेटी राशि के साथ नदी के पानी के बीच खड़ी है। भाव विभोर हो कर बोली-" राशि, मैं हमेशा ट्रेन या बस से सफर करते समय नदी को निहारा करती थी, पर आज डुबकी लगाने का मौका मिला। आज तुम्हारे नानी,नानाजी का तर्पण करके मुझे आत्मसंतुष्टि मिल रही है। भीनी-भीनी ठंड में नदी की थाह का अनुभव मुझे रोमांचित कर रहा है। मैंने सोचा नहीं था-मैं यह सुख भी पा सकूँगी। बेटा, यह सब सम्भव हुआ तुम्हारे सहयोग से। किसी विचित्र बात है ना- नदी से मिलने के लिए मृत्यु ही जरिया बनी ! मैं पानी को देख रही हूं- इससे ज्यादा निर्मल कुछ नहीं हो सकता। इस नदी के पानी में कभी उफान भी आया होगा, तब यह क्रुध्द दिखी होगी ! अभी यह शांत और खामोश है।" "माँ, इतने दिनों से तुम नदी पर ही आने की जिद क्यों कर रही थी ? यह तो घर पर भी हो सकता था।" "हाँ बेटा, पर एक ऋणी पिता और ऋणी बन जाता। मैं इकलौती संतान हूँ। तुम्हारी नानी के जिंदा रहते जब भी वे दोनों मेरे पास आए , मेरे यहाँ खाने से बचते रहे । नानी के गुजरने के ब...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !