ढूंढ रही हूँ, कहाँ है मंजिल खबर नहीं, पस्त हो चुके हैं पांव,आसान ये सफर नहीं। कदमों ने नापा हर डगर, हर मंजर, आंखों को नहीं दिखा कभी मील का पत्थर। मंजिल की जुस्तजू में झोंक दिया सारा दमखम, बेताब तमन्नाओं की कसक रही हरदम। शिद्दत से मुकाम की चाहत ने जुटा दिया, कभी सुना-अंधेरों ने सबेरा होने न दिया? न बैठूंगी आशियां में परों को समेटकर, अभी भी इतनी जान है खुले हैं मेरे पर। रहेगा हौसला, खुली फिजाओं में उड़ान का, खुद से वादा है, मंजिल तक चलते रहने का। मेरी मंजिल- सुकून इतना हो सुख से जिंदगी चल जाए, दुख इतना हो कि शांति से झेल पाएं। रिश्ते इतने गहरे हों प्यार से निभा पाएं, मंजिल इतनी ऊँची न हो 'अपने' ओझल हो जाएं।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !