लाल, पीला, सफेद सभी रंगों का भाई हूँ, मैं काला हूँ। यूं न देखो मुझे तल्ख नजरों से, मैं भी तो एक रंग हूँ। भूलो ना- तुम्हें काला टीका लगा माँ बुरी नजरों से बचाती, काला धागा पहना तुम्हें है सुरक्षित मानती। काले बोर्ड पर लिख अक्षर तुम्हारा जीवन संवरा, सफेद पन्नों पर काला अक्षर ही अद्भुत निखरा। सोचो तो- काले मेघा देख क्यों किसान है नाचता, बरसने पर लहलहाती फसल देख इतराता। झमाझम बरस कर तुम्हें तपिश से बचाता हूँ। बहते पानी से धरती की प्यास बुझाता हूँ। मानो ना- काली कोयल की कुहू कुहू का रसपान करते हो, गोरी की आंखों में देख काजल मुग्ध हो जाते हो। जिस रंग में मिल जाता हूँ, गहरा कर देता हूँ। जहां भी हो फीकापन, अपनी धाक जमाता हूँ। गौर करो- आसमां हो काला तो तारे भी लगते सुंदर, कान्हा भी तो अपने रंग से कहलाए श्यामसुंदर। सिर के सफेद बालों से तुम क्यों हो परेशान भला, कर खिजाब के हवाले, बालों को करते हो काला। विनती है- अन्य रंगों से अलग कर, न करो भेदभाव, तन बदन हो काला, तो करो न दुराव। भला, हुनर कभी रंगों में हैं बसते, जी, हुनर से तो रंग ही हैं सजते।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !