मैं मील का पत्थर हूँ, मैं संकेत वाहक, दिशा निर्देशक हूँ। मिट्टी से लिपटा, जमीन में आधा गड़ा, अब भी वहीं, जहाँ कल था खड़ा। मैं पाषाण हूँ, पर पथ-दृष्टा हूँ, एक मंजिल तक पहुँचने का सोपान हूँ। मुझ में गति कहाँ, पर निगाहें थम जाती हैं, मुझे देख सबकी गति बढ़ जाती है। मैं निर्जीव, असहाय, मूक हूँ, खुद गुमनाम, पर लोगों का सुनिश्चित पता हूँ। हो गया हूँ पत्थर, हर मौसम से पथराते, देख रहा हूँ, राहगीरों को आते-जाते। मैं खड़ा तटस्थ, एक शिला हूँ, पर 'चलते रहो' का संदेश देता हूँ। ऐसा भाग्य कहाँ, इस शिला से मुक्ति पा लूँ, किसी के चरण-रज पाकर, मानव रूप जी लूँ!
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !