मेरे बेटे अश्विन से चूक कैसे हो गई? आज धमकियों के कॉल आ रहे हैं। परेशान हो कर मोबाइल ही बंद कर दिया। क्यों नहीं सीख पाया- व्यवहारिकता- हमारे दिए संस्कारों से। प्रोफेसर का पद एक जिम्मेदारी का पद है- देश और समाज के भविष्य की जिम्मेदारी। एक गंवार को होनहार साबित कर दिया- नोटों के लिफाफे के वजन से। आत्मा धिक्कारती तब तक देर हो चुकी थी। अब लालच दे कर कई बेक़ाबिल विद्यार्थियों के नम्बर बढ़ाने के धमकी भरे फोन आ रहे हैं। मैं भी एक टीचर थी। मेरे माँ पिताजी भी टीचर थे। उनके आदर्श और संस्कार मेरे खून में पूरी तरह बस गए थे। मैंने पढ़ाई के दौरान ही तय कर लिया था- बच्चों को पढ़ाऊंगी। एक शिक्षक होना- मतलब समाज, देश के उत्थान में योगदान। कोई और पेशा सोचा नहीं, समझा नहीं। अकेली संतान होने के नाते माँ पिताजी का ध्यान मुझ पर ज्यादा केंद्रित रहा। जब तक सम्भव हुआ, दोनों स्कूल में पढ़ाते रहे। बाद में सेवनिवृत्ति ले कर घर पर रह कर ही बच्चों को पढ़ाने लगे। आदर्श शिक्षक के रूप में दोनों को सम्मान भरपूर मिला। अपने ही एक होनहार विद्यार्थी से मेरा विव...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !