"दादी, आज अपनी अलमारी की सफाई कर रही हो क्या? ये कागजों का पुलिंदा ! क्या है ये सब?" "अरी, इसे पुलिंदा मत बोल, अमूल्य निधि है ये ।" " दादी, आपने कुछ इन्वेस्ट किया था क्या? एफ डी के कागज हैं क्या?" " ना, राशि बेटा, ये पुरानी चिट्ठियाँ हैं। मेरी माँ, पिताजी, तेरे पापा की, तेरी मम्मी की, तेरे दादा जी की- सभी हाथ से लिखी हुई। एफ डी से ज्यादा कीमती हैं।" "अच्छा दादी, यह बताओ, पहले चिट्ठियाँ डाक से कितने दिनों में मिलती होंगी? यहाँ तो व्हाट्सअप या मेल में तुरन्त पहुंच जाती हैं।" "हाँ, चार-पाँच दिन में मिलती थी और लिखने वाला भी लिखने में समय लगाता था। शब्दों को, अपनी भावनाओं को करीने से जमा कर वाक्य बनाता था। पत्र को पाने वाला भी पत्र को चार बार पढ़ता था।" "दादी, ऐसा करते हैं, आज हम दोनों इस विषय पर ही बात करेंगे। आपने बिना मोबाइल, कंप्यूटर के जीवन बिताया और मैं मोबाइल, कंप्यूटर के बिना जीवन अधूरा समझती हूं।" दूसरे कमरे में बैठे राशि के मम्मी-पापा इन दोनों की बातें सुन रहे थे, वे मुस्करा दिए। वे जानते हैं- दादी-पोती कभी ३६ क...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !