'काश, मेरे पंख होते और मैं उड़ पाती !' आज रीना के देहांत की खबर ने रेखा को विचलित कर दिया। रेखा के छोटे भाई अर्णव की पत्नी रीना। आज भाई को मेरी जरूरत है, पर नकुल की इजाजत के बिना पीहर जाना- अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है। आज मुझे माँ और भाई के पास होना चाहिए। अर्णव के बच्चे बुआ का बाट जोहते ही होंगे ! कुछ ही दिन पहले पड़ोस की दीपा ने रीना की बीमारी के समाचार दिए थे। नकुल से जिक्र किया तो चिल्ला पड़े-'पहले अपना घर संभाल लो।' महिलाओं के जीवन का बड़ा सच है कि पीहर की देहरी भले ही फेरे लेते ही पराई हो जाती है, पर दरवाजे पर दस्तक दे सकने का आश्वासन हमेशा साथ होता है। अब नकुल के गुस्से के डर से रेखा मायके के दरवाजे पर दस्तक देना तो दूर, देहरी पर पहुंचने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही है। हवा का एक झौंका आया, अतीत के पन्नों पर से धूल झड़ने लगी। नकुल की ऑटोमोबाइल के स्पेयर पार्ट्स की फैक्टरी बढ़िया चल रही थी। अर्णव अपनी नौकरी से खुश नहीं था। नकुल ने अर्णव को अपनी फैक्टरी में लगा लिया। काम की सभी बारीक...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !