आज सुबह से सुप्रिया को मोबाइल पर बधाइयां मिल रही हैं। कल अंतर्राज्यीय स्कूलों के बीच सेमिनार था। विषय था -' वर्तमान परिस्थिति में छात्रों का शैक्षिक विकास के साथ सामाजिक विकास कितना जरूरी है?' सुप्रिया गर्ल्स स्कूल की उप-प्रधानाध्यापिका है। सेमिनार में सुप्रिया के विचारों और सटीक तथ्यों से सभी प्रभावित हुए। सुप्रिया ने मोबाइल रखा तो देखा, पीछे सुशील उन्हें टेढ़ी निगाहों से देख रहे हैं। "बड़ी बधाइयां मिल रही हैं , तुमसे तो हर कोई खुश हो जाता है।" "मुझ से नहीं , मेरे काम से , विचारों से।" कहती हुई सुप्रिया रसोई की तरफ मुड़ गई। खाने में, नाश्ते में क्या बनना है- यह सासूजी ही तय करती हैं। यदि मूड ठीक हो तो सब्जी काट कर, दाल भिगो कर रख देती हैं, वरना सुप्रिया को तो करना ही है। हाँ, मेनू तय करने की छूट उसे कभी नहीं मिली, उसने चाही भी नहीं। अच्छा ही है सबकी पसंद नापसन्द के टेंशन से फ्री। आज सासूजी थोड़ी उखड़ी हुई हैं क्योंकि उनका बेटा उखड़ा हुआ है। उनकी तीखी आवाज ने सुप्रिया के कान खड़े कर दिए- "कितनी ही बधाइयां मिल जाय, कहलाएगी तो...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !