वो एक अल्हड़ कमसिन उम्र ही तो थी, रोज एक नए सपने में मैं खो जाती । अपनी बाहें फैला घूमने लगती , आकाश को अपने घेरे के अंदर पाती । उमंगों से भर नाचने लगती जिंदगी , मर्यादा के फ्रेम में जकड़ी ये जिंदगी । दादी की टोका-टाकी, एक बवंडर मचाती , माँ बस सीमित दायरे को ही समझाती । आज भी मां के आशा -आशयों को ही मथ रही , उनके मार्फत अपने अस्तित्व को ही खोज रही , छटपटाती हूँ क्योंकि दायरा है सीमित , न कर सकी अपने वजूद को परिभाषित । माँ हूँ , संतानों को किया मैंने पूर्ण सिंचित , लेकिन पिता तुल्य कुछ भी देने से हूँ वंचित । कुल-गोत्र का नाम नहीं मैं दे सकी , साहस के साथ बैसाखियाँ न तोड़ सकी । क्यों रहना पड़ता है हमें दायरे के भीतर , उलझनें तो नहीं आती, सोच के दायरे के भीतर । रह जाती हैं लबों पर तबस्सुम आंखों में नीर , भीतर के स्त्रीत्व को नेपथ्य में किया स्वीकार। यह समाज क्यों बनाता है दायरा , करनी होगी जद्दोजहद, न कोई आसरा । कब तक सहेंगे ये हाशिये की पीड़ा ? ये पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियां ?
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !