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Showing posts from March, 2018

दायरा

वो एक अल्हड़ कमसिन उम्र ही तो थी, रोज एक नए सपने में मैं खो जाती । अपनी बाहें फैला घूमने लगती , आकाश को अपने घेरे के अंदर पाती । उमंगों से भर नाचने लगती जिंदगी , मर्यादा के फ्रेम में जकड़ी ये जिंदगी । दादी की टोका-टाकी, एक बवंडर मचाती , माँ बस सीमित दायरे को ही समझाती । आज भी मां के आशा -आशयों को ही मथ रही , उनके मार्फत अपने अस्तित्व को ही खोज रही , छटपटाती हूँ क्योंकि दायरा है सीमित , न कर सकी अपने वजूद को परिभाषित । माँ हूँ , संतानों को किया मैंने पूर्ण सिंचित , लेकिन पिता तुल्य कुछ भी देने से हूँ वंचित । कुल-गोत्र का नाम नहीं मैं दे सकी , साहस के साथ बैसाखियाँ न तोड़ सकी । क्यों रहना पड़ता है हमें दायरे के भीतर , उलझनें तो नहीं आती, सोच के दायरे के भीतर । रह जाती हैं लबों पर तबस्सुम आंखों में नीर , भीतर के स्त्रीत्व को नेपथ्य में किया स्वीकार। यह समाज क्यों बनाता है दायरा , करनी होगी जद्दोजहद, न कोई आसरा । कब तक सहेंगे ये हाशिये की पीड़ा ? ये पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियां ?

सुलोचना जी

                        कल की ही बात है। मैं बाजार से घर आ रही थी । मोहल्ले के बच्चों को सड़क पर क्रिकेट खेलते देखा । मेरी चाल धीमी हो गई, क्योंकि इन बच्चों के बीच सुलोचना जी भी थी । वे साड़ी के पल्ले को कसकर, पटलियों को ऊंचा कर कमर में खोंसे हुए एक खिलाड़ी की मुद्रा में खड़ी थी । बच्चों के बीच बेटिंग करती हुई एक नवयुवती थी । जब उसने मेरे पैर छुए, तो याद हो आया -यह तो सुलोचना जी की बहू है । कुछ महीने पूर्व ही बेटे अनिल की शादी हुई है । अनिल गुड़गांव नौकरी करता है । यहां सास -बहू रहती हैं । मैनें सुलोचना जी को नमस्कार किया , वे कहने लगी- "बहू बच्चों के साथ खेलना चाहती थी, तो मैं भी शामिल हो गई ।" कहने को तो सुलोचना जी का वाक्य साधारण ही था, पर इस वाक्य से वे बहुत कुछ कह गए थी । बहू के प्रति उनके उदारवादी विचारों के सामने मैं नतमस्तक हो गई।             मैं सुलोचना जी को कई वर्षों से जानती हूँ । अल्पायु में ही इनके पति का देहांत हो गया । निजी मकान और बेटे की पढ़ाई के कारण ये जयपुर में ही बस गई । जिंदगी भ...

लघुकथा -आशा

            अगले महीने दिव्या के भाई की शादी इसी शहर में है । वह देवेंद्र से कई बार कह चुकी-" मुझे एक नई साड़ी दिला दो । मैं नहीं चाहती, शादी में पुरानी साड़ी पहनूँ ।" ऐसा नहीं था -देवेंद्र का हाथ तंग था । घर में इस बात का कई बार जिक्र हो चुका था। 20 वर्षीय बेटा अंशुल भी अपनी मम्मी की फरमाइश सुन चुका था ।               आज देवेंद्र ने घर आ कर दिव्या को एक पैकेट पकड़ाया । दिव्या की आँखें चमकी । उसने पैकेट लेते हुए कुछ पूछना चाहा, उससे पहले ही देवेंद्र बोल पड़ा -" माँ के लिए एक साड़ी लाया हूँ । घर में मेहमान आते जाते रहेंगे । माँ पर यह साड़ी अच्छी लगेगी । तुम इसे फॉल लगा कर तैयार कर देना । हाँ, तुम अपनी साड़ी के लिए मुझ से रुपये ले लेना ।" अंशुल की निगाह पिता पर टिकी हुई है, वह स्तब्ध है, रोज की चर्चा के बारे में सोचने लगा । दिव्या को इस बात का क्षोभ नहीं है कि देवेंद्र उसके लिए साड़ी नहीं लाए। उसे यह सोच कर खुशी है कि एक बेटा अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता है। रिश्ते निभाने के संस्कार घर से ही मिलते हैं । अंशुल देख रहा है , समझेगा। द...