सोचा, हूँ उम्रदराज, व्यर्थ है देख आईना, सप्ताह बीते, बीते मास, केके रोज देख आईना। खुद को न पहचान पाई, आईने को ही शत्रु पाया, चेहरे की उभरी झुर्रियों से, खुद को कीर पाया। करती रही चेहरे का घर्षण, परतें लगाई अनेक, जुल्फों को दे नया रूप, आई लबों पर तबस्सुम। बेतरतीबी ही सही, मुखमंडल खूबसूरत दिख गया, आईना दिखा गया समय की नजाकत, खुद को अमीर पाया। काश, हम जो चाहते, वो दिखाता आईना। काश, दाएं को बायां न दिखाता आईना। काश, मन पर लगी खरोंचे ही दिखा देता आईना। काश, सूरत की जगह सीरत दिखा देता आईना। हे प्रभु, कोई आईना ऐसा हो, जो चेहरा नहीं किरदार दिखा दे। जो चेहरों पर दिखाते मुस्कान, उनके दिलों का फरेब दिखा दे।
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !