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Showing posts from June, 2020

सावित्री -भाग-2 एक माँ की पीड़ा

            मैं सुंदर के लिए चिंतित थी। सावित्री के घर पहुंची, वहां की स्थिति देख कर स्तंभित रह गई। दोनों के बाल बिखरे हुए, मुँह सूखा हुआ, अस्त व्यस्त, मानो कई दिनों से नहाए नहीं, कुछ खाया नहीं और सोए नहीं। एहसास हो रहा था- दोनों के आँसू भरे हुए हैं, पर रुके हुए हैं। घनश्याम का भाई और उसकी पत्नी दोनों को ढांढस दिला रहे थे। सुंदर पलंग पर लेटा हुआ कराह रहा था। नाभि के नीचे दर्द बता रहा था। मैंने पूछा- " सावित्री, डॉक्टर को दिखाया?" " हाँ, भाभी, गए रहीं, डागदर दावा दिए।" "पर डॉक्टर ने क्या बताया ?" "पेसाब में इनफेक्सन।" घनश्याम का भाई बोला-" कल हम सभी घूमने गए थे, वहां बच्चे तालाब में उतर गए थे-पानी में खूब खेले। वहीं से इन्फेक्शन हो गया है।" सुंदर की तड़प देखकर  मुझे स्थिति चिंताजनक लगी। दो दिन सावित्री काम पर नहीं आई। तीसरे दिन मैंने अपने घर की बालकनी से देखा- घनश्याम सुंदर को गोद में ले कर ऑटो से उतर रहा है और सावित्री पेमेंट कर रही है।             थोड़ी देर बाद मैं सावित्री के पास गई। सावित्री के कहे अगनुसार पता चला-' दूसरे...

सावित्री

            बर्तनों की इतनी ज्यादा आवाज मुझे अच्छी नहीं लग रही थी। यह तो पता था-बर्तन माँजने के लिए सावित्री आ गई है। गिलास के गिरने की आवाज से मैं चौंक गई। बर्तनों में कांच के बर्तन भी हैं, टूट गए तो नुकसान तो होगा ही, कांच के टुकड़ों से किसी के घायल होने की आशंका भी बनी रहेगी। इससे पहले बर्तनों का इतना शोर कभी नहीं हुआ। सच कहूं तो सावित्री का सिर्फ घर में घुसना और काम करके बाहर जाना ही पता चलता था। अभी भी बर्तनों की आवाज आ ही रही थी। मैं उठकर रसोई में गई। मैंने पूछा-"सावित्री, तू ठीक है ना! कुछ परेशानी है क्या?" " हाँ, भाभी, मे ठीक हे, सॉरी।" सावित्री काम कर के चली गई।             सावित्री हमारी सोसायटी के चौकीदार घनश्याम की पत्नी है। ये गोरखपुर के रहवासी हैं। कई वर्षों से ये दोनों हमारी सोसायटी में रह रहे हैं। इससे पूर्व रवि चौकीदारी करता था। वह जवान था, हिंदी अच्छी बोल लेता था। एक दिन हमारे घर आया, बोला- "मैं कल यहाँ की नौकरी छोड़कर जा रहा हूँ। मेरी दूसरी जगह नौकरी लग गई है। बड़ी सोसायटी है, बड़ा शहर है, अच्छी तनख्वाह है। यहां ...