मैं सुंदर के लिए चिंतित थी। सावित्री के घर पहुंची, वहां की स्थिति देख कर स्तंभित रह गई। दोनों के बाल बिखरे हुए, मुँह सूखा हुआ, अस्त व्यस्त, मानो कई दिनों से नहाए नहीं, कुछ खाया नहीं और सोए नहीं। एहसास हो रहा था- दोनों के आँसू भरे हुए हैं, पर रुके हुए हैं। घनश्याम का भाई और उसकी पत्नी दोनों को ढांढस दिला रहे थे। सुंदर पलंग पर लेटा हुआ कराह रहा था। नाभि के नीचे दर्द बता रहा था। मैंने पूछा- " सावित्री, डॉक्टर को दिखाया?" " हाँ, भाभी, गए रहीं, डागदर दावा दिए।" "पर डॉक्टर ने क्या बताया ?" "पेसाब में इनफेक्सन।" घनश्याम का भाई बोला-" कल हम सभी घूमने गए थे, वहां बच्चे तालाब में उतर गए थे-पानी में खूब खेले। वहीं से इन्फेक्शन हो गया है।" सुंदर की तड़प देखकर मुझे स्थिति चिंताजनक लगी। दो दिन सावित्री काम पर नहीं आई। तीसरे दिन मैंने अपने घर की बालकनी से देखा- घनश्याम सुंदर को गोद में ले कर ऑटो से उतर रहा है और सावित्री पेमेंट कर रही है। थोड़ी देर बाद मैं सावित्री के पास गई। सावित्री के कहे अगनुसार पता चला-' दूसरे...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !