घर के काम पूरे होने के बाद मैंने सोचा- सावित्री के हाल चाल ले लूं। जैसे ही उसके घर के पास पहुंची-उसके जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दे रही थी। वह किसी से फोन पर बात कर रही थी। मेरे पदचापों से उसने फोन काट दिया। सावित्री को देख कर मैं स्तब्ध रह गई। बाल बिखरे हुए, आंखें सूजी हुई, मानो बहुत रोई हो। जले हुए हाथ को ढक रखा था। घर की दीवारें साफ थी। कहीं कुकर फटने के निशान नहीं थे। मेरे दिमाग में कई प्रश्न कौंध गए। फिर भी हिम्मत करके पूछा- "सावित्री क्या हुआ? घनश्याम ठीक है ना!" " वो तूफान मचाए हे।" मेरे दिमाग में घनश्याम के प्रति एक पत्नीव्रता और सीधे-सादे पति की छवि बैठी हुई थी। वह भला कैसे तूफान मचा सकता है? कोने में रखे स्टूल पर मैं बैठ गई। सावित्री मेरे सामने बैठ गई। बोली-" भाभी, अब मन ना लगे है, टेम केसे निकलिहे। जिंदगी बोत भारी हे। कोई चाव ही ना बचा। गाड़ी ....रेंगरी...।" यह किस बात के लिए इतनी भूमिका बना रही है, मैं समझ नहीं पाई। "घनसाम हमार चाचा के मरे पे गया हे। चाची कई बरस पहले खतम भइ। चाचा की लईकी हमार भेंन अनाथ भइ। सादी लायक है। घ...
मैं उर्मिला, एक गृहिणी, सांसारिक सुख-दुःख , फ़र्ज़-अधिकार, क़र्ज़-हर्ज़ में रमी हुई महिला हूँ | मैंने खुशनुमा जिन्दगी, बच्चों की परवरिश, बच्चों के विवाह सभी पलों को बहुत जी भरकर जिया | जीवन के उतार-चढ़ाव, अनुभव और अनुभूतियों का तीखा, मीठा, कड़वा रसास्वादन भी हुआ पर कहीं मैं इन सब में बंध कर रह गयी | आज अंतरजाल अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से अपने विचारों को आयाम दे कर स्वयं आज़ाद होना चाहती हूँ- पंखों को खोल कर स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ | उड़ कर देखूँ, पंखों में कितनी ताकत है !