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Showing posts from July, 2020

सावित्री- भाग -4 एक निर्णय सही या गलत

            घर के काम पूरे होने के बाद मैंने सोचा- सावित्री के हाल चाल ले लूं। जैसे ही उसके घर के पास पहुंची-उसके जोर जोर से चिल्लाने की आवाज सुनाई दे रही थी। वह किसी से फोन पर बात कर रही थी। मेरे पदचापों से उसने फोन काट दिया। सावित्री को देख कर मैं स्तब्ध रह गई। बाल बिखरे हुए, आंखें सूजी हुई, मानो बहुत रोई हो। जले हुए हाथ को ढक रखा था। घर की दीवारें साफ थी। कहीं कुकर फटने के निशान नहीं थे। मेरे दिमाग में कई प्रश्न कौंध गए। फिर भी हिम्मत करके पूछा- "सावित्री क्या हुआ? घनश्याम ठीक है ना!" " वो तूफान मचाए हे।" मेरे दिमाग में घनश्याम के प्रति एक पत्नीव्रता और सीधे-सादे पति की छवि बैठी हुई थी। वह भला कैसे तूफान मचा सकता है? कोने में रखे स्टूल पर मैं बैठ गई। सावित्री मेरे सामने बैठ गई। बोली-" भाभी, अब मन ना लगे है, टेम केसे निकलिहे। जिंदगी बोत भारी हे। कोई चाव ही ना बचा। गाड़ी ....रेंगरी...।" यह किस बात के लिए इतनी भूमिका बना रही है, मैं समझ नहीं पाई। "घनसाम हमार चाचा के मरे पे गया हे। चाची कई बरस पहले खतम भइ। चाचा की लईकी हमार भेंन अनाथ भइ। सादी लायक है। घ...

सावित्री- भाग-3 एक और दर्द।

            घनश्याम के तेज बुखार ने सावित्री में हलचल ला दी। डॉक्टरों के इर्द गिर्द घूमना, सेवा सुश्रुषा, शारीरिक पीड़ा-इन सभी दर्दों को वह भूली नहीं थी। रात घनश्याम के लिए काढ़ा बनाया, वह सो गया। सुबह मेरे पास आई, " भाभी, घनसाम को बुखार है। क्या करूं? डागदर के पास...।" वह अधूरे वाक्य के साथ चुप हो गई। मैं समझ गई-यह डॉक्टर के पास जाना नहीं चाहती है। मैने किसी को भेज कर घनश्याम का बुखार नपवाया-100 ही था। एक गोली दे दी और काढ़ा भी देने को कह दिया। शाम तक घनश्याम का बुखार उतर गया। कमजोरी थी दो दिन आराम कर लिया। घनश्याम के बुखार ने सावित्री को सचेत कर दिया। निस्तेज बनी सावित्री में कुछ तेजी आई।              सावित्री मेरे पास आई, "भाभी, गांव जाइहें। बड़का सास ससुर है मिलिहैं।" ''कब तक आओगे?" "दस दिन तो लगिहैं!" दस दिन के लिए घनश्याम ने अपने किसी परिचित को ड्यूटी पर लगा दिया। 20 दिन....दोनों आ गए। अगले दिन सावित्री घर आई। मैंने पूछा- "चाय पिएगी?" " हाँ "कह कर वह बैठ गई। "तेरे सास ससुर कैसे हैं?" "ठीक"-सावित्री की ...